Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 38

77 Mantra
18/38
Devata- ऋतुविद्याविद्विद्वान देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- विराडार्षी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋ॒ता॒षाडृ॒तधा॑मा॒ग्निर्ग॑न्ध॒र्वस्तस्यौष॑धयोऽप्स॒रसो॒ मुदो॒ नाम॑। स न॑ऽइ॒दं ब्रह्म क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥३८॥

ऋ॒ता॒षा॒ट्। ऋ॒तधा॒मेत्यृ॒तऽधा॑मा। अ॒ग्निः। ग॒न्ध॒र्वः। तस्य॑। ओष॑धयः। अ॒प्स॒रसः॑। मुदः॑। नाम॑। सः। नः॒। इ॒दम्। ब्रह्म॑। क्ष॒त्रम्। पा॒तु॒। तस्मै॑। स्वाहा॑। वाट्। ताभ्यः॑। स्वाहा॑ ॥३८ ॥

Mantra without Swara
ऋताषाडृतधामाग्निर्गन्धर्वस्तस्यौषधयोप्सरसो मुदो नाम । स न इदम्ब्रह्म क्षत्रम्पातु तस्मै स्वाहा वाट्ताभ्यः स्वाहा ॥

ऋताषाट्। ऋतधामेत्यृतऽधामा। अग्निः। गन्धर्वः। तस्य। ओषधयः। अप्सरसः। मुदः। नाम। सः। नः। इदम्। ब्रह्म। क्षत्रम्। पातु। तस्मै। स्वाहा। वाट्। ताभ्यः। स्वाहा॥३८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र में 'अभिषिक्त करने' का उल्लेख है। यह अभिषिक्त-सिंहासनारूढ़ हुआ व्यक्ति (ऋताषाट्) = [ऋतं सत्यं सहते, असत्ये कुपितो भवतीत्यर्थः] अपने राष्ट्र में सत्य व्यवहार को ही सहन करता है, असत्य को नहीं। राष्ट्र में से असत्य के उन्मूलन के लिए ही उसका राज्याभिषेक हुआ है। २. इस असत्य के उन्मूलन के लिए यह पहले अपने जीवन में से असत्य का उन्मूलन करता है। असत्य का उन्मूलन करके यह (ऋतधामा) = स्वयं ऋत का धाम बनता है। अपने जीवन में से अमृत को दूर करता है तभी ३. (अग्निः) = राष्ट्र का अग्रेणी बन पाता है। स्वयं अवनत राजा प्रजा को उन्नत नहीं कर सकता। स्वयं ऋत का धाम बनकर अग्नि की भाँति यह राष्ट्र के सब मलों को भस्म करनेवाला होता है । ४. और (गन्धर्वः) = वेदवाणी का धारण करता है अथवा [गां भूमिम्] राष्ट्र का धारण करता है। ५. (तस्य) = उस 'ऋताषाड्' के (अप्सरसः) = [अप्सु सरन्ति] प्रजाओं में विचरण करनेवाले अध्यक्ष लोग (ओषधयः) = [उष दाहे] प्रजाओं में से दोषों का दहन करनेवाले होते हैं। दोषों का दहन करके ही वे (मुदः नाम) = मुद् नामवाले होते हैं [मोदन्ते जना याभिः] सारी प्रजा का अनुरञ्जन - मोद करनेवाले होते हैं । ६. (सः) = ऐसा - इस प्रकार के अप्सरोंवाला यह राजा (न:)= हमारे (इदं ब्रह्म क्षत्रम्) = इस ज्ञान व शक्ति को (पातु) = रक्षित करे। राजा का प्रमुख कर्त्तव्य यही है कि वह प्रजा को मस्तिष्क के दृष्टिकोण से ऊँचे-से-ऊँचे ज्ञानवाला बनाए तथा शरीर के दृष्टिकोण से स्वस्थ व सबल बनाए। आदर्श मनुष्य वे ही हैं जिनके मस्तिष्क व शरीर दोनों उन्नत हैं । ७. इस राजा के लिए (स्वाहा) = [स्व + हा] हम धन का त्याग करते हैं, अर्थात् उचित कर आदि देते हैं, परन्तु उस कर प्राप्त धन को यह राजा (वाट्) [वहति प्रजां प्रापयति] = प्रजाओं के लिए ही फिर से प्राप्त करानेवाला होता है। ८. (ताभ्यः स्वाहा) = उन प्रजाओं में विचरण करनेवाले अध्यक्षों के लिए भी हम [स्वाहा स्व- हा] अपने सुख आदि का त्याग करते हैं, अर्थात् जब वे राष्ट्रीय कार्य से हमारे बीच में उपस्थित होते हैं तब हम उन्हें अधिक-से-अधिक सुविधा पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं।
Essence
भावार्थ - राजा 'ऋताषाट् ऋतधामा, अग्नि व गन्धर्व' हो। उसके अध्यक्ष 'ओषधि व मुद्' हों। ये प्रजा के ब्रह्म व क्षत्र की रक्षा करें। प्रजाएँ राजा को कर दें। राजा उस कर का प्रजाहित में ही विनियोग करे। प्रजाएँ अप्सरों को कार्य में सुविधा पहुँचाने का प्रयत्न करें।
Subject
ऋताषाट् ऋतधामा