Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 36

77 Mantra
18/36
Devata- रसविद्विद्वान् देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- आर्ष्युनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पयः॑ पृथि॒व्यां पय॒ऽओष॑धीषु॒ पयो॑ दि॒व्यन्तरि॑क्षे॒ पयो॑ धाः। पय॑स्वतीः प्र॒दिशः॑ सन्तु॒ मह्य॑म्॥३६॥

पयः॑। पृ॒थि॒व्याम्। पयः॑। ओष॑धीषु। पयः॑। दि॒वि। अ॒न्तरि॑क्षे। पयः॑। धाः॒। पय॑स्वतीः। प्र॒दिश॒ इति॑ प्र॒ऽदिशः॑। स॒न्तु॒। मह्य॑म् ॥३६ ॥

Mantra without Swara
पयः पृथिव्याम्पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः । पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ॥

पयः। पृथिव्याम्। पयः। ओषधीषु। पयः। दिवि। अन्तरिक्षे। पयः। धाः। पयस्वतीः। प्रदिश इति प्रऽदिशः। सन्तु। मह्यम्॥३६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. मेरे लिए (पृथिव्याम्) = पृथिवी में (पयः) = आप्यायन हो । (ओषधीषु) = पृथिवी से उत्पन्न इन ओषधियों में आप्यायनकारी रस हो । २. (पयः दिवि) - इस द्युलोक में भी सूर्यरश्मियों के द्वारा मेरे लिए आप्यायन व वर्धन हो । ३. हे प्रभो! आप कृपा करके (अन्तरिक्षे) =मे घों के आधारभूत अन्तरिक्ष में भी (पयः धा:) = आप्यायन का धारण कीजिए। यह अन्तरिक्षलोक भी मेरे लिए आप्यायन करनेवाला हो। वृष्टि के द्वारा यह उत्तम ओषधियों को प्राप्त कराके मेरे सब अङ्गों में रस का सञ्चार करे। ४. इस प्रकार (मह्यम्) = मेरे लिए (प्रदिशः) = ये प्रकृष्ट दिशाएँ (पयस्वतीः सन्तु) = आप्यायनवाली हों। मेरा सारा वातावरण ही आप्यायन से परिपूर्ण हो। यह सब विश्व मेरे साथ शान्ति में हो और इस प्रकार मेरे वर्धन का कारण बने।
Essence
भावार्थ- पृथिवी, ओषधियाँ, द्युलोक, अन्तरिक्ष व सब प्रकृष्ट दिशाएँ मेरा आप्यायन करनेवाली हों। अब इस आप्यायन ही आप्यायनवाले व्यक्ति का राज्याभिषेक करते हैं -
Subject
आप्यायन