Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 35

77 Mantra
18/35
Devata- रसविद्याविद्विद्वान् देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- विराडार्ष्यनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सं मा॑ सृजामि॒ पय॑सा पृथि॒व्याः सं मा॑ सृजाम्य॒द्भिरोष॑धीभिः। सो॒ऽहं वाज॑ꣳ सनेयमग्ने॥३५॥

सम्। मा। सृ॒जा॒मि॒। पय॑सा। पृ॒थि॒व्याः। सम्। मा। सृ॒जा॒मि। अ॒द्भिरित्य॒त्ऽभिः। ओष॑धीभिः। सः। अ॒हम्। वाज॑म्। स॒ने॒य॒म्। अ॒ग्ने॒ ॥३५ ॥

Mantra without Swara
सम्मा सृजामि पयसा पृथिव्याः सम्मा सृजाम्यद्भिरोषधीभिः । सो हँवाजँ सनेयमग्ने ॥

सम्। मा। सृजामि। पयसा। पृथिव्याः। सम्। मा। सृजामि। अद्भिरित्यत्ऽभिः। ओषधीभिः। सः। अहम्। वाजम्। सनेयम्। अग्ने॥३५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. मैं (पृथिव्या:) = इस पृथिवी के पृथिवीरूप शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्गों के (पयसा) = आप्यायन [ओप्यायी वृद्धौ] से अथवा [पय:- रस] रस से (मा) = मुझे (सं सृजामि) = संसृष्ट करता हूँ, युक्त करता हूँ। मैं अपने सब अङ्गों को शक्तिशाली बनाता हूँ। २. इसी उद्देश्य से मैं (मा) = मुझे, अर्थात् अपने को (अद्भिः) = जलों से तथा (ओषधीभि:) = ओषधियों से (सं सृजामि) = संयुक्त करता हूँ, अर्थात् जलों व ओषधियों का प्रयोग करता हूँ। जल और ओषधियों के प्रयोग से सात्त्विक सोमशक्ति को प्राप्त करता हुआ मैं अपने सब अङ्गों का आप्यापन करनेवाला बनता हूँ। ३. (सः अहम्) = वह मैं अग्ने उन्नति-साधक प्रभो ! (वाजम्) = शक्ति को (सनेयम्) = प्राप्त करूँ। मैं शक्ति से सना हुआ हो जाऊँ। मेरे सब अङ्गों में शक्ति का सञ्चार हो जाए ।
Essence
भावार्थ- हम सम्पूर्ण शरीर का आप्यायन करें। जलों व ओषधियों का प्रयोग करें और एक-एक अङ्ग को शक्ति से युक्त बनाने के लिए यत्नशील हों।
Subject
अप् ओषधि