Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 33

77 Mantra
18/33
Devata- अन्नपतिर्देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वाजो॑ नोऽअ॒द्य प्र सु॑वाति॒ दानं॒ वाजो॑ दे॒वाँ२ऽऋ॒तुभिः॑ कल्पयाति। वाजो॒ हि मा सर्व॑वीरं ज॒जान॒ विश्वा॒ऽआशा॒ वाज॑पतिर्जयेयम्॥३३॥

वाजः॑। नः॒। अ॒द्य। प्र। सु॒वा॒ति॒। दान॑म्। वाजः॑। दे॒वान्। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। क॒ल्प॒या॒ति॒। वाजः॑। हि। मा। सर्व॑वीर॒मिति॒ सर्व॑ऽवीरम्। ज॒जान॑। विश्वाः॑। आशाः॑। वाज॑पति॒रिति॒ वाज॑ऽपतिः। ज॒ये॒य॒म् ॥३३ ॥

Mantra without Swara
वाजो नोऽअद्य प्रसुवाति दानँवाजो देवाँऽऋतुभिः कल्पयाति । वाजो हि मा सर्ववीरञ्जजान विश्वाऽआशा वाजपतिर्जयेयम् ॥

वाजः। नः। अद्य। प्र। सुवाति। दानम्। वाजः। देवान्। ऋतुभिरित्यृतुऽभिः। कल्पयाति। वाजः। हि। मा। सर्ववीरमिति सर्वऽवीरम्। जजान। विश्वाः। आशाः। वाजपतिरिति वाजऽपतिः। जयेयम्॥३३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (वाजः) = शक्ति (न:) = हममें (अद्य) = आज (दानम्) = दान को (प्रसुवाति) = [प्रेरयेत्] प्रेरित करे। शक्तिशाली व्यक्ति कृपणता को कायरता समझता है, इसलिए वह देता है, लेने से वह मरना अच्छा समझता है। २. (वाजः) = यह शक्ति (ऋतुभिः) = नियमित - व्यवस्थित गति द्वारा (देवान्) = दिव्य गुणों को कल्पयाति सिद्ध करती है। शक्ति के कारण हममें दिव्य गुणों का विकास होता है। वर्च [Virtue ] वीरत्व ही तो है और अवीरता ही ईवल [ evil ] है । ३. (वाजः) = यह शक्ति (हि) = निश्चय से (मा) = मुझे (सर्ववीरम्) = सब दिशाओं में वीर-ही-वीर बनाती हैं। मैं दान देने में वीर बनता हूँ, इन्द्रियों के संयम में वीर बनता हूँ, माता-पिता, आचार्य की सेवा में वीर बनता हूँ तथा स्वाध्याय में भी शूर बनता हूँ। ४. (वाजपतिः) = इस शक्ति का पति बनकर (विश्वाः आशाः) = सब दिशाओं को (जयेयम्) - मैं जीतनेवाला बनूँ। मैं कहीं पराजित न होऊँ। 'विजय ही सदाचार है, पराजय ही अनाचार है' इन आचार्य दयानन्द के शब्दों के अनुसार इस वाज के द्वारा मैं सर्वत्र विजयी बनूँ।
Essence
भावार्थ-वाज के द्वारा शक्ति के परिणामस्वरूप मुझमें दान की वृत्ति हो, सब दिव्य गुणों का मुझमें विकास हो। मैं वीर बनूँ और विजयी होऊँ।
Subject
दान-दिव्यता-वीरता-विजय