Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 28

77 Mantra
18/28
Devata- सङ्ग्रामादिविदात्मा देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- भुरिगाकृतिः, आर्ची बृहती Swara- पञ्चमः, मध्यमः
Mantra with Swara
वाजा॑य॒ स्वाहा॑ प्रस॒वाय॒ स्वाहा॑पि॒जाय॒ स्वाहा॒ क्रत॑वे॒ स्वाहा॒ वस॑वे॒ स्वाहा॑ह॒र्पत॑ये॒ स्वाहाह्ने॑ मु॒ग्धाय॒ स्वाहा॑ मु॒ग्धाय॒ वैनꣳशि॒नाय॒ स्वाहा॑ विन॒ꣳशिन॑ऽआन्त्याय॒नाय॒ स्वाहान्त्या॑य भौव॒नाय॒ स्वाहा॒ भुव॑नस्य॒ पत॑ये॒ स्वाहाधि॑पतये॒ स्वाहा॑ प्र॒जाप॑तये॒ स्वाहा॑। इ॒यं ते॒ राण्मि॒त्राय॑ य॒न्तासि॒ यम॑नऽऊ॒र्जे त्वा॒ वृष्ट्यै॑ त्वा प्र॒जानां॒ त्वाधि॑पत्याय॥२८॥

वाजा॑य। स्वाहा॑। प्र॒स॒वायेति॑ प्रऽस॒वाय॑। स्वाहा॑। अ॒पि॒जाय॑। स्वाहा॑। क्रत॑वे। स्वाहा॑। वस॑वे। स्वाहा॑। अ॒ह॒र्पत॑ये। स्वाहा॑। अह्ने॑। मु॒ग्धाय॑ स्वाहा॑। मु॒ग्धाय॑। वै॒न॒ꣳशि॒नाय॑। स्वाहा॑। वि॒न॒ꣳशिन॒ इति॑ विन॒ꣳशिने॑। आ॒न्त्या॒य॒नाय॑। स्वाहा॑। आन्त्या॑य। भौ॒व॒नाय॑। स्वाहा॑। भुव॑नस्य। पत॑ये। स्वाहा॑। अधि॑पतय॒ इत्यधि॑ऽपतये। स्वाहा॑। प्र॒जाप॑तय॒ इति॑ प्र॒जाऽप॑तये। स्वाहा॑। इ॒यम्। ते॒। राट्। मि॒त्राय॑। य॒न्ता। अ॒सि॒। यम॑नः। ऊ॒र्जे। त्वा॒। वृष्ट्यै॑। त्वा॒। प्र॒जाना॒मिति॑ प्र॒ऽजाना॑म्। त्वा॒। आधि॑पत्या॒येत्याधि॑ऽपत्याय ॥२८ ॥

Mantra without Swara
वाजाय स्वाहा प्रसवाय स्वाहापिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा वसवे स्वाहाहर्पतये स्वाहाह्ने स्वाहा मुग्धाय स्वाहा मुग्धाय वैनँशिनाय स्वाहाविनँशिन आन्त्यायनाय स्वाहान्त्याय भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहाधिपतये स्वाहा प्रजापतये स्वाहा । इयन्ते राण्मित्राय यन्तासि यमन ऊर्जे त्वा वृष्ट्यै त्वा प्रजानान्त्वाधिपत्याय ॥

वाजाय। स्वाहा। प्रसवायेति प्रऽसवाय। स्वाहा। अपिजाय। स्वाहा। क्रतवे। स्वाहा। वसवे। स्वाहा। अहर्पतये। स्वाहा। अह्ने। मुग्धाय स्वाहा। मुग्धाय। वैनꣳशिनाय। स्वाहा। विनꣳशिन इति विनꣳशिने। आन्त्यायनाय। स्वाहा। आन्त्याय। भौवनाय। स्वाहा। भुवनस्य। पतये। स्वाहा। अधिपतय इत्यधिऽपतये। स्वाहा। प्रजापतय इति प्रजाऽपतये। स्वाहा। इयम्। ते। राट्। मित्राय। यन्ता। असि। यमनः। ऊर्जे। त्वा। वृष्टयै। त्वा। प्रजानामिति प्रऽजानाम्। त्वा। आधिपत्यायेत्याधिऽपत्याय॥२८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रस्तुत मन्त्र में वाजादि शब्दों से चैत्रादि मासों का उल्लेख करके कहते हैं कि उस - उस मास के लिए (स्वाहा) = हम सम्यक् आहुति देते हैं- [क] (वाजाय) = चैत्र मास के लिए [वाज: अन्नम् ] अन्न के प्राचुर्य के कारण चैत्र मास अन्नरूप है, उसके लिए (स्वाहा) = हम आहुति देते हैं। [ख] (प्रसवाय) = प्रकृष्ट 'सव' अर्थात् स्नानवाले इस वैशाख मास के लिए (स्वाहा) = हम आहुति देते हैं, अर्थात् इस मास को यज्ञों में बिताते हैं। [ग] (अपिजाय) = [अप्सु जायते जलक्रीडारतत्वात् ज्येष्ठः] जो मास जल क्रीड़ादि में ही बीतता है उस ज्येष्ठ मास के लिए (स्वाहा) = हम आहुति देते हैं। [घ] (क्रतवे स्वाहा) = चातुर्मास्यादि यागों के प्राचुर्य के कारण आषाढ़ मास 'क्रतु' है, उस क्रतु के लिए हम उत्तम आहुति देते हैं। [ङ] चातुर्मास्य में यात्रादि निषेद्य के कारण श्रावण 'वसु' हैं, घर में ही निवास करानेवाला है। इस (वसवे स्वाहा) = श्रावण मास के लिए हम आहुति देते हैं। [च] [तापकरत्वाद् भाद्रपदस्य अहर्पतित्वम्] (अहर्पतयेऽस्वाहा) = मैं भाद्रपद मास के लिए आहुति देता हूँ। [छ] [तुषारादिना मोहरूपत्वं आश्विनः] (अह्ने मुग्धाय स्वाहा) = ओस आदि के कारण जिसमें स्पष्ट नहीं दीखता उस मुग्ध दिनोंवाले आश्विन मास के लिए मैं आहुति देता हूँ। [ज] (अमुग्धाय) = जिसमें अब ओस आदि न गिरने के कारण दिङ्मोह नहीं होता ऐसे (वैनंशिनाय) = थोड़ी घड़ियाँ होने से विनाशशील दिनोंवाले कार्तिक मास के लिए (स्वाहा) = हम आहुति देते हैं [झ] (अविनंशिने) = विनाश न होने देनेवाले (आन्त्यायनाय) = उस प्रभु के समीप पहुँचानेवाले [ अन्तेभवः आन्त्यः च अयनं च] जो सबके अन्त में रहनेवाले तथा सबके अयन हैं, उस मार्गशीर्ष मास के लिए (स्वाहा) = हम सम्यक् आहुति देते हैं। ('मासानां मार्गशीर्षोऽहम्') = इस वाक्य में मार्गशीर्ष मास को प्रभु की विभूति माना गया है। [ञ] (आन्त्याय) = जिसमें छोटे दिनों का अन्त आ जाता है उस भौवनाय - जाठराग्नि की वृद्धि से प्राणियों के हितकर पौष मास के लिए (स्वाहा) = हम आहुति देते हैं। [ट] (भुवनस्य पतये स्वाहा) = प्राणियों के पालक माघ मास के लिए आहुति देता हूँ। [ठ] अन्त में (अधिपतये स्वाहा) = आधिक्येन रक्षक इस फाल्गुन मास के लिए आहुति देता हूँ और इस प्रकार (प्रजापतये स्वाहा) = प्रजापतिरूप इस संवत्सर के लिए आहुति देता हूँ, अर्थात् मेरा वर्ष यज्ञमय बीतता है। २. इस प्रकार जहाँ सारा वर्ष यज्ञ चलता है वहाँ (इयं ते राट्) = यह तेरा ही राज्य है। प्रभु के साम्राज्य में यज्ञ चलते हैं अथवा जहाँ यज्ञ हैं, वहाँ प्रभु का राज्य है। ३. (मित्राय यन्तासि) = मुझ यज्ञशील अपने मित्र के लिए तू इस शरीर - रूप रथ का सारथि है। मेरे जीवन - रथ को चलानेवाला है । ४. (यमनः) = तू अन्तर्यामिरूपेण सबका नियमन करनेवाला है । ५. हे प्रभो ! मैं (त्वा) = आपको (ऊर्जे) = बल और प्राणशक्ति की प्राप्ति के लिए उपासित करता हूँ। वृष्टयै (त्वा) = मैं इसलिए आपकी उपासना करता हूँ कि आनन्द की वर्षा का अनुभव करूँ । (त्वा) = आपका उपासक इसलिए बनता हूँ कि (प्रजानां आधिपत्याय) = प्रजाओं का मैं आधिक्येन रक्षण करनेवाला बनूँ।
Essence
भावार्थ- मेरा सम्पूर्ण वर्ष यज्ञमय बीते। मैं प्रभु का उपासक बनकर बल व प्राणशक्ति को प्राप्त करूँ, आनन्द की वर्षा का अनुभव करूँ तथा प्रजाओं का अधिपति बनूँ ।
Subject
नामग्राह होम