Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 24

77 Mantra
18/24
Devata- विषमाङ्कगणितविद्याविदात्मा देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- संकृतिः, विराट् संकृतिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
एका॑ च मे ति॒स्रश्च॑ मे ति॒स्रश्च॑ मे॒ पञ्च॑ च मे॒ पञ्च॑ च मे स॒प्त च॑ मे स॒प्त च॑ मे॒ नव॑ च मे॒ नव॑ च म॒ऽएका॑दश च म॒ऽएका॑दश च मे॒ त्रयो॑दश च मे॒ त्रयो॑दश च मे॒ पञ्च॑दश च मे॒ पञ्च॑दश॒ च मे स॒प्तद॑श च मे स॒प्तद॑श च मे॒ नव॑दश च मे॒ नव॑दश च मऽएक॑विꣳशतिश्च म॒ऽएक॑विꣳशतिश्च मे॒ त्रयो॑विꣳशतिश्च मे त्रयो॑विꣳशतिश्च मे॒ पञ्च॑विꣳशतिश्च मे॒ पञ्च॑विꣳशतिश्च मे स॒प्तवि॑ꣳशतिश्च मे स॒प्तवि॑ꣳशतिश्च मे॒ नव॑विꣳशतिश्च मे॒ नव॑विꣳशतिश्च म॒ऽएक॑त्रिꣳशच्च म॒ऽएक॑त्रिꣳशच्च मे॒ त्रय॑स्त्रिꣳशच्च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥२४॥

एका॑। च॒। मे॒। ति॒स्रः। च॒। मे॒। ति॒स्रः। च॒। मे॒। पञ्च॑। च॒। मे॒। पञ्च॑। च॒। मे॒। स॒प्त। च॒। मे॒। स॒प्त। च॒। मे। नव॑। च॒। मे॒। नव॑। च॒। मे॒। एका॑दश। च॒। मे॒। एका॑दश। च॒। मे॒। त्रयो॑द॒शेति॒ त्रयः॑ऽदश। च॒। मे॒। त्रयो॑द॒शेति॒ त्रयः॑ऽदशः। च॒। मे॒। पञ्च॑द॒शेति॒ पञ्च॑ऽदश। च॒। मे॒। पञ्च॑द॒शेति॒ पञ्च॑दश। च॒। मे॒। स॒प्तद॒शेति॒ स॒प्तऽद॑श। च॒। मे॒। स॒प्तद॒शेति॒ स॒प्तऽद॑श। च॒। मे॒ नव॑द॒शेति॒ नव॑ऽदश। च॒। मे॒। नव॑द॒शेति॒ नव॑ऽदश। च॒। मे॒। एक॑विꣳशति॒रित्येक॑ऽविꣳशतिः। च॒। मे॒। एक॑विꣳशति॒रित्येक॑ऽविꣳशतिः। च॒। मे॒। त्रयो॑विꣳशति॒रिति॒ त्रयः॑ऽविꣳशतिः। च॒। मे॒। त्रयो॑विꣳशति॒रिति॒ त्रयः॑ऽविꣳशतिः। च॒। मे॒। पञ्च॑विꣳशति॒रिति॒ पञ्च॑ऽविꣳशतिः। च॒। मे॒। पञ्च॑विऽꣳशतिरिति॒ पञ्च॑ऽविꣳशतिः। च॒। मे॒। स॒प्तवि॑ꣳशति॒रिति॑ स॒प्तऽवि॑ꣳशतिः। च॒। मे॒। स॒प्तवि॑ꣳशति॒रिति॑ स॒प्तऽवि॑ꣳशतिः। च॒। मे॒। नव॑विꣳशति॒रिति॒ नव॑ऽविꣳशतिः। च॒। मे॒। नव॑विꣳशति॒रिति॒ नव॑ऽविꣳशतिः। च॒। मे॒। एक॑त्रिꣳश॒दित्येक॑ऽत्रिꣳशत्। च॒। मे॒। एक॑त्रिꣳश॒दित्येक॑ऽत्रिꣳशत्। च॒। मे॒। त्रय॑स्त्रिꣳश॒दिति॒ त्रयः॑ऽत्रिꣳशत्। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥२४ ॥

Mantra without Swara
एका च मे तिस्रश्च मे तिस्रश्च मे पञ्च च मे पञ्च च मे सप्त च मे सप्त च मे नव च मे नव च म एकादश च म एकादश च मे त्रयोदश च मे त्रयोदश च मे पञ्चदश च मे पञ्चदश च मे सप्तदश च मे सप्तदश च मे नवदश च मे नवदश च म एकविँशतिश्च म एकविँशतिश्च मे त्रयोविँशतिश्च मे त्रयोविँशतिश्च मे पञ्चविँशतिश्च मे पञ्चविँशतिश्च मे सप्तविँशश्च मे सप्तविँशतिश्च मे नवविँशतिश्च मे नवविँशतिश्च म एकत्रिँशच्च म एकत्रिँशच्च मे त्रयस्त्रिँशच्च मे त्रयस्त्रिँशच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥

एका। च। मे। तिस्रः। च। मे। तिस्रः। च। मे। पञ्च। च। मे। पञ्च। च। मे। सप्त। च। मे। सप्त। च। मे। नव। च। मे। नव। च। मे। एकादश। च। मे। एकादश। च। मे। त्रयोदशेति त्रयःऽदश। च। मे। त्रयोदशेति त्रयःऽदशः। च। मे। पञ्चदशेति पञ्चऽदश। च। मे। पञ्चदशेति पञ्चदश। च। मे। सप्तदशेति सप्तऽदश। च। मे। सप्तदशेति सप्तऽदश। च। मे नवदशेति नवऽदश। च। मे। नवदशेति नवऽदश। च। मे। एकविꣳशतिरित्येकऽविꣳशतिः। च। मे। एकविꣳशतिरित्येकऽविꣳशतिः। च। मे। त्रयोविꣳशतिरिति त्रयःऽविꣳशतिः। च। मे। त्रयोविꣳशतिरिति त्रयःऽविꣳशतिः। च। मे। पञ्चविꣳशतिरिति पञ्चऽविꣳशतिः। च। मे। पञ्चविऽꣳशतिरिति पञ्चऽविꣳशतिः। च। मे। सप्तविꣳशतिरिति सप्तऽविꣳशतिः। च। मे। सप्तविꣳशतिरिति सप्तऽविꣳशतिः। च। मे। नवविꣳशतिरिति नवऽविꣳशतिः। च। मे। नवविꣳशतिरिति नवऽविꣳशतिः। च। मे। एकत्रिꣳशदित्येकऽत्रिꣳशत्। च। मे। एकत्रिꣳशदित्येकऽत्रिꣳशत्। च। मे। त्रयस्त्रिꣳशदिति त्रयःऽत्रिꣳशत्। च। मे। यज्ञेन। कल्पन्ताम्॥२४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (एका च मे तिस्रः च मे) = एक देवता को मैं अपनानेवाला बनूँ और एक देवता को अपनाने के द्वारा तीनों देवताओं को मैं अपनानेवाला बनूँ। वस्तुतः गुणों का यह स्वभाव है कि एक गुण को अपने अन्दर धारण करने से अन्य गुणों को मैं अपने में धारण करनेवाला बनता हूँ। गुणों की एक शृंखला है। उस शृंखला की एक कड़ी को पकड़कर अपनी ओर आकृष्ट करेंगे तो शृंखला की शृंखला हमारी ओर खिंची चली आएगी। २. (तिस्रः च मे पञ्च च मे) = तीन देवताओं को मैं धारण करता हूँ और इससे पाँच देवताओं का धारण करनेवाला बनता हूँ। ३. (पञ्च च मे सप्त च मे) = पाँच दिव्य गुणों को धारण करता हुआ मैं सात दिव्य गुणों को अपने में ग्रहण करता हूँ। ४. (सप्त च मे नव च मे) = सात के धारण से नौ का धारण होता है। ५. (नव च म एकादश च मे) = नौ मेरे होते हैं, और इससे ग्यारह-के-ग्यारह पृथिवीस्थ देव मेरे हो जाते हैं। अध्यात्म में पृथिवी यह शरीर है। इस शरीर के 'पुरमेकादश द्वारम्' इन उपनिषत् शब्दों में वर्णित सभी ग्यारह द्वारों के अधिष्ठातृ देव मुझमें अपना-अपना स्थान ठीक रूप में ग्रहण करते हैं। ६. (एकादश च मे त्रयोदश च मे) = मेरे शरीर के ग्यारह देवों के ठीक स्थान ग्रहण करने पर हृदयान्तरिक्ष के बारहवें व तेरहवें देव भी मेरे होते हैं। ७ (त्रयोदश च मे पञ्चदश च मे) = तेरह देव मेरे होते हैं और पन्द्रह देवों को मैं ग्रहण करता हूँ। ८. (पञ्चदश च मे सप्तदश च मे) = पन्द्रह मेरे होते हैं और उससे मैं सतरह को अपनाता हूँ। ९. (सप्तदश च में नवदश च मे) सतरह देवों को मैं अपनाता हूँ और उससे उन्नीस देव मेरे होते हैं। १०. (नवदश च मे एकविंशतिः च मे) = उन्नीस देव मेरे होते हैं, और उससे इक्कीस देवों को मैं अपनानेवाला होता हूँ। ११. (एकविंशतिः च मे त्रयोविंशतिः च मे) = इक्कीस देव मेरे होते हैं और उससे तेईस देवों को मैं अपनाता हूँ। १२. हृदयान्तरिक्ष के देवों के साथ मस्तिष्करूप द्युलोक के देव भी मेरे होते हैं (त्रयोविंशतिः च मे पञ्चविंशतिः च मे) = तेईस को अपनाकर पच्चीस को मैं अपनाता हूँ। १३. (पञ्चविंशतिः च मे सप्तविंशः च मे) = पच्चीस तो मेरे होते ही हैं मैं अपने में सताईस का धारण करता हूँ। १४. (सप्तविंशतिः च मे नव विंशतिः च मे) = सताईस मेरे होते हैं और उनसे उन्तीस भी मेरे हो जाते हैं । १५. (नवविंशतिः च मे एकत्रिंशत् च मे) = उन्तीस मेरे होते हैं और इकतीस को मैं अपना लेता हूँ और अन्त में १६. (एकत्रिंशत् च मे त्रयस्त्रिंशत् च मे) = इकतीस देव तो मेरे होते ही हैं, मैं तेंतीस -के-तेंतीस देवों को अपनानेवाला बनता हूँ। ये सब देव (यज्ञेन) = प्रभु के उपासन से (कल्पन्ताम्) = मुझे प्राप्त हों। अथवा प्रभु से सम्पर्क के निमित्त मुझे समर्थ करें।
Essence
भावार्थ - तेतीस देवों का अपनाना ही मेरा प्रभु-स्तवन होता है। ये ही मेरे स्तोम हो जाते हैं और शतपथ ९ | ३ | ३ | २ के ('एतद्यजमाना सर्वान् कामानाप्त्वा युग्भिः स्तोमैः स्वर्गं लोकमेति') इन शब्दों के अनुसार मैं इन 'एक, तीन, पाँच व सात' आदि के क्रम से विषम संख्याओं में चलनेवाले स्तोमों से इस लोक में सब वाञ्छनीय पदार्थों को प्राप्त करके स्वर्ग को प्राप्त करूँ।
Subject
तेतीस देवता