Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 16

77 Mantra
18/16
Devata- अग्नदिविद्याविदात्मा देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- निचृदतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒ग्निश्च॑ म॒ऽइन्द्र॑श्च मे॒ सोम॑श्च म॒ऽइ॒न्द्र॑श्च मे सवि॒ता च॑ म॒ऽइन्द्र॑श्च मे॒ सर॑स्वती च म॒ऽइन्द्र॑श्च मे पू॒षा च॑ म॒ऽइन्द्र॑श्च मे॒ बृह॒स्पति॑श्च म॒ऽइन्द्र॑श्च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥१६॥

अ॒ग्निः। च॒। मे॒। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। सोमः॑। च॒। मे॒। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। स॒वि॒ता। च॒। मे॒। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। सर॑स्वती। च॒। मे॒। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। पू॒षा। च॒। मे॒। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। बृह॒स्पतिः॑। च॒। मे॒। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥१६ ॥

Mantra without Swara
अग्निश्च मऽइन्द्रश्च मे सोमश्च मऽइन्द्रश्च मे सविता च मऽइन्द्रश्च मे सरस्वती च मऽइन्द्रश्च मे पूषा च मऽइन्द्रश्च मे बृहस्पतिश्च मऽइन्द्रश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥

अग्निः। च। मे। इन्द्रः। च। मे। सोमः। च। मे। इन्द्रः। च। मे। सविता। च। मे। इन्द्रः। च। मे। सरस्वती। च। मे। इन्द्रः। च। मे। पूषा। च। मे। इन्द्रः। च। मे। बृहस्पतिः। च। मे। इन्द्रः। च। मे। यज्ञेन। कल्पन्ताम्॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र की समाप्ति पर लक्ष्य की ओर चलने व लक्ष्य को प्राप्त करने का उल्लेख था, प्रस्तुत मन्त्रों में लक्ष्य का वर्णन करते हैं-अग्निः च मे मुझमें अग्नितत्त्व हो । अपने को आगे और आगे बढ़ाने की वृत्ति हो। २. (सोमः च मे) = मैं सौम्य बनूँ । जितना - जितना आगे बढ़ता जाऊँ उतना उतना विनीत होता चलूँ। वस्तुतः इस विनीतता से ही तो मैं आगे बढूँगा । ३. (सविता च मे) = मैं प्रशस्त ऐश्वर्यवाला बनूँ। निर्माण [Produc tion] के कार्यों के द्वारा मैं धन का सम्पादन करनेवाला बनूँ और साथ ही ४. (सरस्वती च मे) = प्रशस्त बोध व शिक्षायुक्त वाणीवाला मैं होऊँ। ५. (पूषा च मे) = शरीर का मैं सभी दृष्टिकोणों से पोषण करूँ और ६. (बृहस्पतिः च मे) = ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञानी, ज्ञानियों का भी ज्ञानी- मैं देवगुरु बन सकूँ। ७. उल्लिखित प्रार्थनाओं में प्रत्येक प्रार्थना के साथ 'इन्द्रश्च मे' ये शब्द जोड़े गये हैं। उसका अभिप्राय स्पष्ट है कि मैं 'इन्द्र' जितेन्द्रिय बनूँ । जितेन्द्रियता से ही जीवन का मन्त्र - वर्णित लक्ष्य पूर्ण हो सकता है। जितेन्द्रिय बनकर ही मैं 'अग्नि, सोम, सविता, सरस्वती, पूषा व बृहस्पति' बन सकूँगा । जितेन्द्रियता वह केन्द्र है जिसके चारों ओर सभी सद्गुण परिधि के रूप में होते हैं। ये सब गुण (यज्ञेन) = प्रभु- सम्पर्क द्वारा (कल्पन्ताम्) = मुझे समर्थ बनाएँ।
Essence
भावार्थ- मेरा जीवन लक्ष्य 'आगे बढ़ना, सौम्य बनना, उत्पादनात्मक कार्यों से ऐश्वर्य प्राप्त करना, प्रशस्त बोधवाला होना, शरीर का ठीक पोषण करना व ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञानी बनना हो । '
Subject
अग्नि + + इन्द्र लक्ष्य [संख्या - १]