Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 15

77 Mantra
18/15
Devata- धनादियुक्ता आत्मा देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- विराडार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वसु॑ चे मे वस॒तिश्च॑ मे॒ कर्म॑ च मे॒ शक्ति॑श्च॒ मेऽर्थ॑श्च म॒ऽएम॑श्च मऽइ॒त्या च॑ मे॒ गति॑श्च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥१५॥

वसु॑। च॒। मे॒। व॒स॒तिः। च॒। मे॒। कर्म॑। च॒। मे॒। शक्तिः॑। च॒। मे॒। अर्थः॑। च॒। मे॒। एमः॑। च॒। मे॒। इ॒त्या। च॒। मे॒। गतिः॑। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥१५ ॥

Mantra without Swara
वसु च मे वसतिश्च मे कर्म च मे शक्तिश्च मे र्थश्च मऽएमश्च मऽइत्या च मे गतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥

वसु। च। मे। वसतिः। च। मे। कर्म। च। मे। शक्तिः। च। मे। अर्थः। च। मे। एमः। च। मे। इत्या। च। मे। गतिः। च। मे। यज्ञेन। कल्पन्ताम्॥१५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र की समाप्ति पर माता-पिता से प्राप्त धन व अपने कमाये हुए धन का उल्लेख था। प्रस्तुत मन्त्र में उसी धन के ठीक विनियोग के द्वारा उत्तम गृह व उत्तम जीवन के निर्माण का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि-(वसु च मे) = निवास के लिए गौ इत्यादि सब आवश्यक वस्तुएँ मुझे प्राप्त हों। (वसतिः च मे) = मेरा सुन्दर निवास स्थान हो । 'यहाँ वसति शब्द छोटी-सी कुटिया' की भावना को लिये हुए है, अतः स्पष्ट है कि वेद बहुत बड़ी-बड़ी कोठियों के पक्ष में नहीं है। २. उस घर में रहता हुआ मैं (कर्म च मे) = अग्निहोत्रादि कर्मों को करनेवाला बनूँ। (शक्तिः च मे) = इन कर्मों में लगे रहने से मेरी शक्ति बनी रहे, अथवा कर्मों को करने की मेरी शक्ति स्थिर रहे । (अर्थः च मे) = मेरा प्रयोजन हो, अर्थात् मैं प्रत्येक कर्म को किसी प्रयोजन को सामने रखकर करूँ, मेरी कोई चेष्टा व्यर्थ न हो। (एमः च मे) = [ईयते = जाना जाता है] मेरे जीवन का एक उद्देश्य [ Aim ] हो । निरुद्देश्य जीवन में मनुष्य कभी उन्नत्ति नहीं कर सकता । ४. (इत्या च मे) = उस उद्देश्य की ओर मेरा निरन्तर चलना हो। (गतिः च मे) = [ गति = to get ] और निरन्तर चलते हुए मुझे उद्देश्य की प्राप्ति हो। ये सब बातें (यज्ञेन) = प्रभु- सम्पर्क के द्वारा (कल्पन्ताम्) = सम्पन्न हों। बनूँ।
Essence
भावार्थ- प्रभुकृपा से मुझे वसु व वसति की प्राप्ति हो । कर्मों द्वारा मैं शक्तिसम्पन्न मेरे कार्य निष्प्रयोजन न हों-जीवन निरुद्देश्य न हो। मैं उद्देश्य की ओर चलूँ और उसे प्राप्त करनेवाला बनूँ।
Subject
वसु+गति