Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 14

77 Mantra
18/14
Devata- अग्न्यादियुक्ता आत्मा देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- भुरिगष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ॒ग्निश्च॑ म॒ऽआप॑श्च मे वी॒रुध॑श्च म॒ऽओष॑धयश्च मे कृष्टप॒च्याश्च॑ मेऽकृष्टप॒च्याश्च॑ मे ग्रा॒म्याश्च॑ मे प॒शव॑ऽआर॒ण्याश्च॑ मे वि॒त्तञ्च॑ मे॒ वित्ति॑श्च मे भू॒तञ्च॑ मे॒ भूति॑श्च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥१४॥

अ॒ग्निः। च॒। मे॒। आपः॑। च॒। मे॒। वी॒रुधः॑। च॒। मे॒। ओष॑धयः। च॒। मे॒। कृ॒ष्ट॒प॒च्याः इति॑ कृष्टऽप॒च्याः। च॒। मे॒। अ॒कृ॒ष्ट॒प॒च्या इत्य॑कृष्टऽप॒च्याः। च॒। मे॒। ग्रा॒म्याः। च॒। मे॒। प॒शवः॑। आ॒र॒ण्याः। च॒। मे॒। वि॒त्तम्। च॒। मे॒। वित्तिः॑। च॒। मे॒। भू॒तम्। च॒। मे॒। भूतिः॑। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥१४ ॥

Mantra without Swara
अग्निश्च मऽआपश्च मे वीरुधश्च मऽओषधयश्च मे कृष्टपच्याश्च मे कृष्टपच्याश्च मे ग्राम्याश्च मे पशवऽआरण्याश्च मे वित्तं च मे वित्तिश्च मे भूतञ्च मे भूतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥

अग्निः। च। मे। आपः। च। मे। वीरुधः। च। मे। ओषधयः। च। मे। कृष्टपच्याः इति कृष्टऽपच्याः। च। मे। अकृष्टपच्या इत्यकृष्टऽपच्याः। च। मे। ग्राम्याः। च। मे। पशवः। आरण्याः। च। मे। वित्तम्। च। मे। वित्तिः। च। मे। भूतम्। च। मे। भूतिः। च। मे। यज्ञेन। कल्पन्ताम्॥१४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र में विविध भूप्रदेशों व धातुओं का वर्णन हुआ है। प्रस्तुत मन्त्र में अग्नि आदि अन्य जीवनोपयोगी तत्त्वों का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि (अग्निः च मे) = अग्नितत्त्व मेरे लिए हो और आपश्च मे मैं जलतत्त्व को अपनानेवाला बनूँ। ये दोनों तत्त्व मेरे विविध कार्यों को सिद्ध करें। मेरे स्वभाव में भी 'अग्नि व जल' का समन्वय हो, मुझमें उत्साह व शान्ति हो। मैं शक्ति व शान्ति का मेल करनेवाला बनूँ। २. (वीरुधः च मे, ओषधयः च) = में मैं वीरुधः = फैलनेवाली बेलों पर होनेवाली वस्तुओं का प्रयोग करूँ तथा फलपाकान्त व्रीहि-यवादि ओषधियों को अपनाऊँ। ३. (कृष्टपच्याः च मे) = भूमि - कर्षण तथा बीज-वपन [हल चलाना, बीज बोना] आदि कर्मों से निष्पन्न ओषधियाँ मेरी हों, तथा (अकृष्टपच्याः च मे) = स्वयमेव उत्पद्यमान नीवार आदि वनस्पतियों को मैं उपजाऊँ। ४. इनके अतिरिक्त (ग्राम्याः च मे) = गौ, घोड़ा भैंस, बकरी, भेड़, गधा, ऊँट आदि ग्राम्य पशु मेरे कार्य साधक हों तथा आरण्याः च मे अरण्य (वन) में होनेवाले हाथी, मृग, गव्य, बन्दर आदि भी मेरे उस-उस कार्य को सिद्ध करनेवाले हों। ५. इन सबके द्वारा (वित्तं च मे वित्तिः च मे) = प्राप्त धन मेरा हो तथा प्राप्तव्य धन को मैं प्राप्त करनेवाला बनूँ। ६. (भूतं च मे भूतिः च मे) = माता-पितादि से प्राप्त धन मेरा हो तथा स्वार्जित भूति [ऐश्वर्य] का मैं मालिक होऊँ। ये सब वस्तुएँ (यज्ञेन) = प्रभु- सम्पर्क से (कल्पन्ताम्) = मुझे शक्तिशाली बनाएँ।
Essence
भावार्थ - इस पृथिवी पर होनेवाले अग्नि, जलादि तत्त्व, बेलें, ओषधियाँ, ग्राम्य व आरण्यभोजन तथा सब पशु व धन मेरे लिए उपयोगी व सहायक हों।
Subject
अग्नि-भूति