Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 12

77 Mantra
18/12
Devata- धान्यदा आत्मा देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- भुरिगतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
व्री॒हय॑श्च मे॒ यवा॑श्च मे॒ माषा॑श्च मे॒ तिला॑श्च मे मु॒द्गाश्च॑ मे॒ खल्वा॑श्च मे प्रि॒यङ्ग॑वश्च॒ मेऽण॑वश्च मे श्या॒माक॑ाश्च मे नी॒वारा॑श्च मे गो॒धूमा॑श्च मे म॒सूरा॑श्च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥१२॥

व्री॒हयः॑। च॒। मे॒। यवाः॑। च॒। मे॒। माषाः॑। च॒। मे॒। तिलाः॑। च॒। मे॒। मु॒द्गाः। च॒। मे॒। खल्वाः॑। च॒। मे॒। प्रि॒यङ्ग॑वः। च॒। मे॒। अण॑वः। च॒। मे॒। श्या॒माकाः॑। च॒। मे॒। नी॒वाराः॑। च॒। मे॒। गो॒धूमाः॑। च॒। मे॒। म॒सूराः॑। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥१२ ॥

Mantra without Swara
व्रीहयश्च मे यवाश्च मे माषाश्च मे तिलाश्च मे मुद्राश्च मे खल्वाश्च मे प्रियङ्गवश्च मे णवश्च मे श्यामाकाश्च मे नीवाराश्च मे गोधूमाश्च मे मसूराश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥

व्रीहयः। च। मे। यवाः। च। मे। माषाः। च। मे। तिलाः। च। मे। मुद्गाः। च। मे। खल्वाः। च। मे। प्रियङ्गवः। च। मे। अणवः। च। मे। श्यामाकाः। च। मे। नीवाराः। च। मे। गोधूमाः। च। मे। मसूराः। च। मे। यज्ञेन। कल्पन्ताम्॥१२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र की समाप्ति 'मति व सुमति' पर हुई थी। उस 'मति व सुमति' का सम्पादन करने के लिए मैं व्रीहि और यव आदि उत्तम ओषधियों का ही सेवन करूँ। मेरा भोजन वानस्पतिक ही हो। वनस्पति का अर्थ ही 'वन' ज्ञानरश्मियों का 'पति' रक्षा करनेवाला है। मांसाहार मनुष्य-स्वभाव को कुछ क्रूर बनानेवाला है। यह मनुष्य को स्वार्थी - सा बना देता है, अतः कहते हैं कि- (व्रीहयः च मे) = मेरा भोजन चावल हों । (यवाः च मे) = मेरा भोजन जौ हों। २. (माषाः च मे) = मैं माषों उड़द का प्रयोग करूँ और (तिलाः च मे) = तिलों को अपनाऊँ। ३. (मुद्गाः च मे) = मूँग मेरे भोजन का अङ्ग हों और (खल्वाः च मे) = चणों को मैं भोजन बनाऊँ। ४. (प्रियङ्गवः च मे) = कगु मेरा भोजन हो और (अणवश्च मे) = चीनक मेरा भोजनाङ्ग बने। ५. (श्यामाकाः च मे) = ग्राम्य तृणधानों [कोदों] को मैं अपनाऊँ, (नीवाराश्च मे) = मैं आरण्य तृणधानों का सेवन करूँ। ६. (गोधूमाः च मे) = मैं गेहूँ को अपनाऊँ तथा (मसूराः च मे) = मसूर का सेवन करूँ। (यज्ञेन) = प्रभु- सम्पर्क से मेरे ये सब वानस्पतिक भोजन (कल्पन्ताम्) = मुझे सामर्थ्य सम्पन्न बनानेवाले हों। मैं सदा शाकाहारी बना रहकर सशक्त बनूँ। अपनी ज्ञानरश्मियों को बढ़ाऊँ तथा प्रभु के समीप पहुँचनेवाला बनूँ।
Essence
भावार्थ- मेरा भोजन वनस्पति ही हो।
Subject
व्रीहि-मसूर