Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 10

77 Mantra
18/10
Devata- आत्मा देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- निचृच्छक्वरी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
र॒यिश्च॑ मे॒ राय॑श्च मे पु॒ष्टं च॑ मे॒ पुष्टि॑श्च मे वि॒भु च॑ मे प्र॒भु च॑ मे पू॒र्णं च॑ मे पू॒र्णत॑रं च मे॒ कुय॑वं च॒ मेऽक्षि॑तं च॒ मेऽन्नं॑ च॒ मेऽक्षु॑च्च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥१०॥

र॒यिः। च॒। मे॒। रायः॑। च॒। मे॒। पु॒ष्टम्। च॒। मे॒। पुष्टिः॑। च॒। मे॒। वि॒भ्विति॑ वि॒ऽभु। च॒। मे॒। प्र॒भ्विति॑ प्र॒ऽभु। च॒। मे॒। पू॒र्णम्। च॒। मे॒। पू॒र्णत॑र॒मिति॑ पू॒र्णऽत॑रम्। च॒। मे॒। कुय॑वम्। च॒। मे॒। अक्षि॑तम्। च॒। मे॒। अन्न॑म्। च॒। मे॒। अक्षु॑त्। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥१० ॥

Mantra without Swara
रयिश्च मे रायश्च मे पुष्टञ्च मे पुष्टिश्च मे विभु च मे प्रभु च मे पूर्णञ्च मे पूर्णतरञ्च मे कुयवञ्च मे क्षितञ्च मे न्नञ्च मे क्षुच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥

रयिः। च। मे। रायः। च। मे। पुष्टम्। च। मे। पुष्टिः। च। मे। विभ्विति विऽभु। च। मे। प्रभ्विति प्रऽभु। च। मे। पूर्णम्। च। मे। पूर्णतरमिति पूर्णऽतरम्। च। मे। कुयवम्। च। मे। अक्षितम्। च। मे। अन्नम्। च। मे। अक्षुत्। च। मे। यज्ञेन। कल्पन्ताम्॥१०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र का प्रारम्भ 'ऊर्क्' = प्राणशक्ति की प्रार्थना से हुआ था, प्रस्तुत मन्त्र 'रयि' की प्रार्थना से प्रारम्भ होता है। ('आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा') = प्रश्नोपनिषद् के इस वाक्य में प्राण और रयि का सम्बन्ध सुव्यक्त है। इन देवों के मेल से ही सृष्टि की उत्पत्ति होती है। (‘रयिं सोमो रयिपतिर्दधातु') = इस वाक्य से रयि का सोम से सम्बन्ध है। मुझमें जहाँ (ऊर्क्) = प्राण हो वहाँ (रयिः) = सोमशक्ति भी हो। इस रयि के साथ रायश्च मे मुझे वे धन भी प्राप्त हों, जिन्हें मैं उदारतापूर्वक दान कर सकूँ [राति दानकर्मणः] । २. (पुष्टं च मे) = मुझे धन का पोषण प्राप्त हो । जहाँ मैं आर्थिक दृष्टि से निर्बल न होऊँ वहाँ (पुष्टिश्च मे) = मुझे शरीर का पोषण भी प्राप्त हो। धन विलास द्वारा मेरी शारीरिक निर्बलता का कारण न बन जाए। ३. धन व शारीरिक बल प्राप्त करके (विभु च मे) = मुझे व्याप्ति-सामर्थ्य प्राप्त हो । मेरा हृदय विशाल हो और साथ ही प्रभु च मे मुझे प्रभावशक्ति भी प्राप्त हो। मैं प्रभुत्व करने में समर्थ होऊँ। ४. (पूर्णं च मे) = इस प्रकार मैं धन व पुत्रादि की पूर्णतावाला होऊँ और (पूर्णतरं च मे) गवादि पशुओं की पूर्णता भी मुझे प्राप्त हो । ५. (कुयवं च मे) = यह [कु] पृथिवी - सम्बन्धी (यव) = जौ मेरे हों तथा (अक्षितं च मे) = जिनसे नाश नहीं होता ऐसे धान्य मुझे प्राप्त हों । ६. (अन्नं च मे) = मुझे सब आवश्यक अन्न प्राप्त हों तथा (अक्षुत् च मे) = मैं भूखा न रह जाऊँ, मैं अन्न से तृप्ति का अनुभव करूँ।
Essence
भावार्थ- मुझमें रयिशक्ति हो तथा दान देने योग्य धन हो, मुझे धन व शरीर का पोषण प्राप्त हो। मैं अन्न का सेवन करूँ और भूखा न रह जाऊँ।
Subject
रयि- अक्षुत्