Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 96

99 Mantra
17/96
Devata- यज्ञपुरुषो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒भिप्र॑वन्त॒ सम॑नेव॒ योषाः॑ कल्या॒ण्यः] स्मय॑मानासोऽअ॒ग्निम्। घृ॒तस्य॒ धाराः॑ स॒मिधो॑ नसन्त॒ ता जु॑षा॒णो ह॑र्यति जा॒तवे॑दाः॥९६॥

अ॒भि। प्र॒व॒न्त॒। सम॑ने॒वेति॒ सम॑नाऽइव। योषाः॑। क॒ल्या॒ण्यः᳕। स्मय॑मानासः। अ॒ग्निम्। घृ॒तस्य॑। धाराः॑। स॒मिध॒ इति॑ स॒म्ऽइधः॑। न॒स॒न्त॒। ताः। जु॒षा॒णः। ह॒र्यति॒। जा॒तवे॑दाः ॥९६ ॥

Mantra without Swara
अभि प्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः स्मयमानासोऽअग्निम् । घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्यति जातवेदाः ॥

अभि। प्रवन्त। समनेवेति समनाऽइव। योषाः। कल्याण्यः। स्मयमानासः। अग्निम्। घृतस्य। धाराः। समिध इति सम्ऽइधः। नसन्त। ताः। जुषाणः। हर्यति। जातवेदाः॥९६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (घृतस्य धारा:) = ज्ञान की वाणियाँ [क] (समनेव योषा:) = समान मनवाली स्त्रियों के समान हैं। जैसे पत्नी यज्ञार्थ पुरुष के साथ सङ्गत होकर उसे अशुभ से निवृत्त करती और शुभ में लगाती है, इसी प्रकार ये ज्ञान की वाणी भी 'अग्नि' के लिए योषा बनती है। यह उसका अशुभ से अमिश्रण करती तथा शुभ के साथ मिश्रण करती है। [ख] (कल्याण्यः) = पाप से पृथक् व पुण्य से सङ्गत करके ये कल्याण करनेवाली हैं। [ग] (स्मयमानासः) = ये हमें सदा विकसित पुण्य की भाँति प्रसन्न करनेवाली हैं। [घ] (समिधः) = ये अग्नि-जीव को ज्ञान-दीप्त करनेवाली है। [इन्धू- दीप्तौ ] २. (नसन्त) = [नस हरणे] ये ज्ञान की धाराएँ सब मलिनताओं का हरण करती हैं और इस अग्नि के जीवन को दीप्त कर देती हैं। ३. (ताः जुषाण:) = इन ज्ञान-वाणियों का प्रेमपूर्वक सेवन करता हुआ यह (जातवेदाः) = उत्पन्न विज्ञानवाला अग्नि (हर्यति) = [हर्य गतौ] गतिशील होता है। ज्ञानी बनकर कर्मनिष्ठ होता है। उपनिषद् के शब्दों में 'क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ' यह ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ पुरुष क्रियावाला बनता है। ज्ञान उसे अधिक क्रियाशील बनानेवाला होता है।
Essence
भावार्थ - अग्नि को वे ज्ञान की वाणियाँ प्राप्त होती हैं जो उसका हित चाहती हुई उसे अशुभ से पृथक् और शुभ से संयुक्त करती हैं। उसका कल्याण करती हुई उसके मन:प्रसाद का कारण बनती हैं। उसे ज्ञान- दीप्त करके क्रियाशील बनाती हैं।
Subject
ज्ञानी क्रियाशील