Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 95

99 Mantra
17/95
Devata- यज्ञपुरुषो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सिन्धो॑रिव प्राध्व॒ने शू॑घ॒नासो॒ वात॑प्रमियः पतयन्ति य॒ह्वाः। घृ॒तस्य॒ धारा॑ऽअरु॒षो न वा॒जी काष्ठा॑ भि॒न्दन्नू॒र्मिभिः॒ पिन्व॑मानः॥९५॥

सिन्धो॑रि॒वेति॒ सिन्धाःऽइव। प्रा॒ध्व॒न इति॑ प्रऽअध्व॒ने। शू॒घ॒नासः॑। वात॑प्रमिय॒ इति॒ वात॑ऽप्रमियः। प॒त॒य॒न्ति॒। य॒ह्वाः। घृतस्य॑। धाराः॑। अ॒रु॒षः। न। वा॒जी। काष्ठाः॑। भि॒न्दन्। ऊ॒र्मिभि॒रित्यू॒र्मिः॑। पिन्व॑मानः ॥९५ ॥

Mantra without Swara
सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः । घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः ॥

सिन्धोरिवेति सिन्धाःऽइव। प्राध्वन इति प्रऽअध्वने। शूघनासः। वातप्रमिय इति वातऽप्रमियः। पतयन्ति। यह्वाः। घृतस्य। धाराः। अरुषः। न। वाजी। काष्ठाः। भिन्दन्। ऊर्मिभिरित्यूर्मिः। पिन्वमानः॥९५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (यह्वाः) = महान् (घृतस्य धारा:) = ज्ञान की धाराएँ इस प्रकार मेरे हृदय में (पतयन्ति) = गति करती हैं (इव) = जैसे (सिन्धोः) = समुद्र की (वातप्रमियः) = [ वातेन प्रमीयन्ते कश्यन्ति ] वायु से छिन्न-भिन्न की जानेवाली (शूघनासः) = शीघ्र गमनवाली [शु क्षिप्रं घनं गमनं येषां हन्- गति] लहरें (प्राध्वने) = [प्रगतोऽध्वन:- प्राध्वनो विषमप्रदेश:] विषम प्रदेश में गिरती हैं। ज्ञान की धाराएँ मेरे हृदय - समुद्र को निरन्तर तरंगित करनेवाली होती हैं। २. (अरुषः न) = यह ज्ञानी पुरुष [ न रुष: अरोषण:] जाति आदि से उत्कृष्ट अरोषण घोड़े की भाँति होता है। उस घोड़े की भाँति यह भी (वाजी) = शक्तिशाली होता है। ३. (काष्ठाः भिन्दन्) = [काष्ठा-आज्यन्त ] संग्राम-प्रदेशों का यह विदारण करनेवाला होता है, अर्थात् संग्राम में शत्रुओं का विदारण करके यह अवश्य विजयशील बनता है। ४. इस प्रकार अध्यात्म-संग्राम में विजय प्राप्त करके यह (ऊर्मिभिः पिन्वमानः) = ज्ञान की लहरों से प्रजाओं को सींचता हुआ गति करता है। इसकी जीवन-यात्रा का क्रम यह होता है- यह [क] हृदय-शोधन से ज्ञान प्राप्त करता है। [ख] अरोषण-क्रोधशून्य व शक्तिशाली होता है। [ग] इन्द्रिय- संग्राम में इन्द्रियों को विषयों से बचाता है। [घ] और अपने ज्ञान जल से औरों को भी सींचता है।
Essence
भावार्थ- हम ज्ञानी बनकर अध्यात्म-संग्राम में विजय प्राप्त करें, दूसरों को भी ज्ञान प्राप्त कराएँ।
Subject
अरुषो न वाजी