Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 9

99 Mantra
17/9
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स नः॑ पावक दीदि॒वोऽग्ने दे॒वाँ२ऽइ॒हा व॑ह। उप॑ य॒ज्ञꣳ ह॒विश्च॑ नः॥९॥

सः नः॒। पा॒व॒क॒। दी॒दि॒व इति॑ दीदि॒ऽवः। अग्ने॑। दे॒वान्। इ॒ह। आ। व॒ह॒। उप॑। य॒ज्ञम्। ह॒विः। च॒। नः॒ ॥९ ॥

Mantra without Swara
स नः पावक दीदिवो ग्ने देवाँ इहाऽवह । उप यज्ञँ हविश्च नः ॥

सः नः। पावक। दीदिव इति दीदिऽवः। अग्ने। देवान्। इह। आ। वह। उप। यज्ञम्। हविः। च। नः॥९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की भावना को ही अधिक विस्तृत करते हुए कहते हैं कि हे (अग्ने) = प्रगतिशील पावक अपने जीवन को पवित्र करनेवाले तथा (दीदिवः) = ज्ञान-ज्योति से देदीप्यमान मेधातिथे! (नः) = हमारा बना हुआ तू, अर्थात् प्रकृति में न फँसा हुआ तू इह = इस मानव जीवन में (देवान्) = दिव्य गुणों को (आवह) = समन्तात् प्राप्त करनेवाला बन । २. (च) = और (नः) = हमारा बना हुआ तू (यज्ञं उप) = सदा यज्ञों के समीप होनेवाला हो, अर्थात् तेरा जीवन यज्ञों से कभी दूर न हो। ३. और इस प्रकार (हविः) = तू हविरूप बन जा । अधिक-से-अधिक त्याग करनेवाला बन। [हु दानादनयोः] 'दानपूर्वक अदन' तो तेरा व्रत ही बन जाए। [तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः = त्यागपूर्वक उपभोग कर ] - इस उपदेश को तू अपने जीवन में मूर्तरूप दे। 'केवलाघो भवति केवलादी'-' अकेला खानेवाला पाप ही खाता है' तेरा सिद्धान्त बन जाए।
Essence
भावार्थ - प्रभु का प्यारा दिव्य गुणों को अपनाता है, यज्ञशील होता है और अपने जीवन को हविरूप बना देता है, सदा दानपूर्वक यज्ञशेष को ही खानेवाला होता है।
Subject
यज्ञ + हविः