Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 87

99 Mantra
17/87
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सप्तऋषय ऋषयः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मꣳ स्तन॒मूर्ज॑स्वन्तं धया॒पां प्रपी॑नमग्ने सरि॒रस्य॒ मध्ये॑। उत्सं॑ जुषस्व॒ मधु॑मन्तमर्वन्त्समु॒द्रिय॒ꣳ सद॑न॒मावि॑शस्व॥८७॥

इ॒मम्। स्तन॑म्। ऊर्ज॑स्वन्तम्। ध॒य॒। अ॒पाम्। प्रपी॑न॒मिति॒ प्रऽपी॑नम्। अ॒ग्ने॒। स॒रि॒रस्य॑। मध्ये॑। उत्स॑म्। जु॒ष॒स्व॒। मधु॑मन्त॒मिति॒ मधु॑ऽमन्तम्। अ॒र्व॒न्। स॒मु॒द्रिय॑म्। सद॑नम्। आ। वि॒श॒स्व॒ ॥८७ ॥

Mantra without Swara
इमँ स्तनमूर्जस्वन्तन्धयापाम्प्रपीनमग्ने सरिरस्य मध्ये । उत्सञ्जुषस्व मधुमन्तमर्वन्त्समुद्रियँ सदनमाविशस्व ॥

इमम्। स्तनम्। ऊर्जस्वन्तम्। धय। अपाम्। प्रपीनमिति प्रऽपीनम्। अग्ने। सरिरस्य। मध्ये। उत्सम्। जुषस्व। मधुमन्तमिति मधुऽमन्तम्। अर्वन्। समुद्रियम्। सदनम्। आ। विशस्व॥८७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. सब प्रकार की वासनाओं को समाप्त करके तथा यज्ञिय वृत्ति को उत्पन्न करके 'सप्त ऋषयः' को चाहिए कि वे प्रभु की इस वेदवाणी का श्रवण करें। वेदवाणी 'गौ' है। उसका स्तन-पान करना ही ज्ञान प्राप्त करना है। (इमम्) = इस (ऊर्जस्वन्तम्) = उत्तम बल व प्राणशक्ति को देनेवाले (स्तनम्) = स्तन को तू (धय) = पी । 'स्तनपान करने' का अभिप्राय वेदवाणी का ज्ञान प्राप्त करना है। २. यह वेदज्ञान (अपां प्रपीनम्) = कर्मों का वर्धन करनेवाला है। [प्रपीनं पूर्णम्] इसमें विविध कर्मों का उपदेश दिया गया है । ३. (अग्ने) = हे प्रगतिशील जीव ! तू सरिरस्य मध्ये = [इमे वै लोकाः सरिरम्] इन लोकों में अथवा [ सरिर = गति ] इस सारी सांसारिक क्रिया के बीच में, यज्ञादि कार्यों के मध्य में - (उत्सम्) = इस वेदवाणीरूप ज्ञान के चश्मे का (जुषस्व) = सेवन कर। ४. यह ज्ञान का (उत्स) = [स्रोत] (मधुमन्तम्) = अत्यन्त माधुर्यवाला है। वेद माधुर्य के उपदेश से पूर्ण है। वेद के अनुसार जीव की प्रार्थना है कि 'भूयासं मधुसन्दृश:' मैं मिठास ही मिठास हो जाऊँ, 'वाचा वदामि मधुमत्' -वाणी से मधुपूर्ण शब्दों को ही बोलूँ। इस प्रकार माधुर्य से परिपूर्ण होकर ५ (अर्वन्) = घोड़े की भाँति अपने कर्त्तव्य मार्ग को मापनेवाले जीव ! अथवा अपने को ब्रह्मरूप लक्ष्य के वेधन के लिए प्रणवरूप धनुष का तीर [arrow= अर्वन्] बनानेवाले जीव! तू (समुद्रियम्) = सदा आनन्दमय [समुद्र] प्रभु-सम्बन्धी (सदनम्) = गृह में (आविशस्व) = प्रविष्ट हो । प्रभु तेरा गृह हैं। तूने अन्ततः अपने घर में ही तो पहुँचना है, इस यात्रा में भटक नहीं जाना।
Essence
भावार्थ - १. हम वेदवाणीरूप गौ का दूध पीएँ। यह हमें शक्ति देगा। यह हमें हमारे कर्त्तव्यों का बोध देगा। २. माधुर्यमय ज्ञान के स्रोत का सेवन करते हुए हम उस प्रभु में प्रवेश करनेवाले बनें, वे प्रभु तो हमारे 'आनन्दमय सदन' है।
Subject
समुद्रिय सदन प्रवेश