Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 84

99 Mantra
17/84
Devata- मरुतो देवताः Rishi- सप्तऋषय ऋषयः Chhand- निचृदार्षी जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ई॒दृक्षा॑सऽएता॒दृक्षा॑सऽऊ॒ षु णः॑ स॒दृक्षा॑सः॒ प्रति॑सदृक्षास॒ऽएत॑न। मि॒तास॑श्च॒ सम्मि॑तासो नोऽअ॒द्य सभ॑रसो मरुतो य॒ज्ञेऽअ॒स्मिन्॥८४॥

ई॒दृक्षा॑सः। ए॒ता॒दृक्षा॑सः। ऊँ॒ऽइत्यूँ॑। सु। नः॒। स॒दृक्षा॑स॒ इति॑ स॒ऽदृक्षा॑सः। प्रति॑सदृक्षास॒ इति॒ प्रति॑ऽसदृक्षासः। आ। इ॒त॒न॒। मि॒तासः॑। च॒। सम्मि॑तास॒ इति॒ सम्ऽमि॑तासः। नः॒। अ॒द्य। सभ॑रस॒ इति॒ सऽभ॑रसः। म॒रु॒तः॒। य॒ज्ञे। अ॒स्मिन् ॥८४ ॥

Mantra without Swara
ईदृक्षास एतादृक्षासऽऊ षु णः सदृक्षासः प्रतिसदृक्षासऽएतन । मितासश्च सम्मितासो नोऽअद्य सभरसो मरुतो यज्ञे अस्मिन् ॥

ईदृक्षासः। एतादृक्षासः। ऊँऽइत्यूँ। सु। नः। सदृक्षास इति सऽदृक्षासः। प्रतिसदृक्षास इति प्रतिऽसदृक्षासः। आ। इतन। मितासः। च। सम्मितास इति सम्ऽमितासः। नः। अद्य। सभरस इति सऽभरसः। मरुतः। यज्ञे। अस्मिन्॥८४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ये प्राणसाधक (ईदृक्षास:) = [इदं पश्यन्ति] = इस संसार को देखते हैं। इस संसार को ठीक रूप में देखने के कारण वे संसार को घृणा से देखनेवाले व हर समय घबराये हुए-से नहीं होते। २. (एतादृक्षासः) = [ एतान् पश्यन्ति ] ये प्राणसाधक इन जीवों को भी ठीक रूप में देखते हैं और उनकी मनोवृत्ति को समझने के कारण इनका व्यवहार सदा ठीक होता है, ये शुष्क वाद-विवादों में नहीं फँस जाते । ३. (सदृक्षास:) = [ समानं पश्यन्ति ] ये सबको समानरूप में देखते हैं। इनका बर्ताव पक्षपातशून्य होता है, और ४. (प्रतिसदृक्षासः) = उस-उस व्यक्ति के प्रति अनुकूलता से देखनेवाले होते हैं, अर्थात् सबके साथ अनुकूलता-सम्पादन में समर्थ होते हैं। ५. (मितासश्च) = प्रत्येक कार्य में बड़े मपे-तुले कार्योंवाले होते हैं । ६. (सम्मितासो:) = सम्यक्तया मपे-तुले आहार-विहारवाले होते हैं तथा ७. (सभरसो) = सबके साथ मिलकर खानेवाले होते हैं। ऐसे ये (मरुतः) = मितराविणः कम बोलनेवाले प्राणसाधक (अद्य) = आज (नः अस्मिन् यज्ञे) = हमारे इस यज्ञ में (उ) = निश्चय में (सु) = उत्तमता में (एतन) = आएँ, प्राप्त हों।
Essence
भावार्थ- इस जीवनयज्ञ में हमारा सम्पर्क 'ईदृक्षास एतादृक्षास प्रतिसदृक्षास, मित, सम्मित व सभरस्' मरुतों से होगा तो हम भी इस प्रकार के जीवनवाले बन पाएँगे।
Subject
ईदृक्ष- एतादृक्ष