Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 81

99 Mantra
17/81
Devata- मरुतो देवताः Rishi- सप्तऋषय ऋषयः Chhand- आर्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ई॒दृङ् चा॑न्या॒दृङ् च॑ स॒दृङ् च॒ प्रति॑सदृङ् च। मि॒तश्च॒ सम्मि॑तश्च॒ सभ॑राः॥८१॥

ई॒दृङ्। च॒। अ॒न्या॒दृङ्। च॒। स॒दृङ्। स॒दृङिति॑ स॒ऽदृङ्। च॒। प्रति॑सदृ॒ङ्ङिति॒ प्रति॑ऽसदृङ्। च॒। मि॒तः। च॒। सम्मि॑त॒ इति॒ सम्ऽमि॑तः। च॒। सभ॑रा॒ इति॒ सऽभ॑राः ॥८१ ॥

Mantra without Swara
ईदृङ्चान्यदृङ्च सदृङ्च प्रतिसदृङ्च । मितश्च सम्मितश्च सभराः ॥

ईदृङ्। च। अन्यादृङ्। च। सदृङ्। सदृङिति सऽदृङ्। च। प्रतिसदृङ्ङिति प्रतिऽसदृङ्। च। मितः। च। सम्मित इति सम्ऽमितः। च। सभरा इति सऽभराः॥८१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र का प्राणसाधक संसार के स्वरूप को भी ठीक-ठीक समझता है। वह यह जान लेता है कि यह संसार [क] (ईदृङ च) = [अनेन तुल्यः] ऐसा ही है। संसार के अन्दर मुझे कृतघ्नता व पिशुनता लगती है। कई बार मैं इस संसार से घृणा करने लगता हूँ, परन्तु प्राणसाधना करने पर मुझे ये सब कुछ स्वाभाविक-सी दिखती हैं और मैं संसार को उसके ठीक रूप में देखने लगता हूँ और कह उठता हूँ कि (ईदृङ् च) = यह तो ऐसा है ही [ख] (अन्यादृङ् च) = [अन्येन समान:] दूसरे जैसा भी तो है ही। इसमें कुछ 'दुर्हृद्' हैं तो 'सुहृद्' भी हैं ही। दुर्जन हैं तो सज्जन भी हैं। [ग] (सदृङ् च) = [समानं पश्यति] बहुत-से व्यक्ति ठीक मेरे जैसे भी यहाँ दिखते हैं। [घ] और (प्रतिसदृङ् च) = [तं तं प्रतिसदृशं पश्यति] ऐसे भी लोग हैं जोकि उस उस व्यक्ति के अनुकूल अपने को बना लेते हैं। संसार में मेधावी पुरुष अपने सम्पर्क में आनेवाले पुरुषों के साथ अपने को अनुकूल बनाने का प्रयत्न करता ही है। २. इस प्रकार संसार के स्वरूप को ठीक-ठीक देखता हुआ, लोगों की मनोवृत्तियों को समझता हुआ यह अपने निजू व्यवहार में (मितः च) = [मितं अस्य अस्ति ] प्रत्येक वस्तु को मितरूप से, अर्थात् माप-तोलकर करनेवाला होता है। (संमितश्च) = खानपान में तो पूर्णतया मित होता है। सम्यक्तया मित आहार-विहार के कारण यह पूर्ण स्वस्थ रहता है। ३. सब कर्मों में युक्त चेष्ट तथा मित आहार-विहारवाला होने के साथ यह (सभराः) = [सह बिभर्ति] मिलकर भरण-पोषण करनेवाला होता है, कभी अकेला खानेवाला नहीं बनता।
Essence
भावार्थ- प्राणसाधना से १. यह संसार को ठीक रूप में देखता है। २. मपी-तुली क्रियाओंवाला होता है। ३. सबके साथ मिलकर खाता है, 'केवलादी' नहीं बनता। दूसरे शब्दों में यज्ञशेष खानेवाला होता है।
Subject
प्राणसाधना से युक्ताहारविहार