Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 79

99 Mantra
17/79
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सप्तऋषय ऋषयः Chhand- आर्षी जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स॒प्त ते॑ऽअग्ने स॒मिधः॑ स॒प्त जि॒ह्वाः स॒प्तऽऋष॑यः स॒प्त धाम॑ प्रि॒याणि॑। स॒प्त होत्राः॑ सप्त॒धा त्वा॑ यजन्ति स॒प्त योनी॒रापृ॑णस्व घृ॒तेन॒ स्वाहा॑॥७९॥

स॒प्त। ते॒। अ॒ग्ने॒। स॒मिध॒ इति॑ स॒म्ऽइधः॑। स॒प्त। जि॒ह्वाः। स॒प्त। ऋष॑यः। स॒प्त। धाम॑। प्रि॒याणि॑। स॒प्त। होत्राः॑। स॒प्त॒ऽधा। त्वा॒। य॒ज॒न्ति॒। स॒प्त। योनीः॑। आ। पृ॒ण॒स्व॒। घृ॒तेन॑। स्वाहा॑ ॥७९ ॥

Mantra without Swara
सप्त तेऽअग्ने समिधः सप्त जिह्वाः सप्त ऋषयः सप्त धाम प्रियाणि । सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीरापृणस्व घृतेन स्वाहा ॥

सप्त। ते। अग्ने। समिध इति सम्ऽइधः। सप्त। जिह्वाः। सप्त। ऋषयः। सप्त। धाम। प्रियाणि। सप्त। होत्राः। सप्तऽधा। त्वा। यजन्ति। सप्त। योनीः। आ। पृणस्व। घृतेन। स्वाहा॥७९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र में 'चित्तिं जुहोमि' शब्दों से अपने में ज्ञान की आहुति देने का उल्लेख है। इस ज्ञानयज्ञ के लिए प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि हे (अग्ने) = अपने को ज्ञान से प्रकाशित करनेवाले जीव! अपने अन्दर ज्ञानाग्नि को दीप्त करनेवाले जीव ! (ते) = तेरी (सप्त समिध:) = सात प्राण ही समिधाएँ हैं। अग्नि को समिधाएँ समिद्ध करती हैं, तेरे ज्ञानाग्नि को सात प्राण [प्राणा वाव इन्द्रियाणि, कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम् ] समिद्ध करते हैं, अतः ये प्राण ही उस अग्नि की समिधाएँ हैं [प्राणा वै समिधः प्राणा ह्येते समिन्धते श० ९ |२| ३ | ४४ ] । २. (सप्त जिह्वा:) = सात ही इस ज्ञानाग्नि की ज्वालाएँ हैं । 'महत्तत्व' का ज्ञान एक ज्वाला है। तो ' अहंकार' का ज्ञान दूसरी ज्वाला है और 'पंचतन्मात्राओं' का ज्ञान अगली पाँच ज्वालाएँ हैं। ये सात ही प्रकृति - विकृतियाँ हैं, इनका ज्ञान ज्ञानाग्नि की सप्त ज्वाला के रूप से यहाँ कहा गया है। ३. (सप्त ऋषय:) = पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मन तथा बुद्धि ये सात ऋषि इस ज्ञानयज्ञ को चलानेवाले हैं। ४. (सप्त धाम प्रियाणि) = सात तेरे प्रियधाम हैं। यह ज्ञान वेद के सात गायत्र्यादि छन्दों में रक्खा गया है, अतः ये सात छन्द उस ज्ञान के प्रिय निवास स्थान हैं। [छन्दांसि वा अस्य सप्त धाम प्रियाणि श० ९ |२| ३ | ४४ । ] ५. (सप्त होत्रा:) = ये वेद की गायत्र्यादि सात छन्दों में विभक्त सात वाणियाँ (सप्तधा) = सात प्रकार से (त्वा यजन्ति) = तेरे साथ सङ्गत होती हैं। ६. तू इन (सप्त योनी:) = ज्ञान की उत्पत्ति की कारणभूत सात वाणियों को (घृतेन) = मलों के क्षरण व दीप्ति के द्वारा (आपृणस्व) = [ आपूरयस्व - उ० ] अपने में पूरित कर। ७. (स्वाहा) = इस अपने में आपूरणरूप क्रिया के लिए तू [स्व] अपना [हा] त्याग करनेवाला बन। जितनी जितनी त्यागवृत्ति बढ़ेगी उतना उतना ही तू ज्ञान को अपने में आपूरित करने में समर्थ होगा।
Essence
भावार्थ- प्राण ज्ञानाग्नि को समिद्ध करते हैं, क्योंकि इन प्राणों के द्वारा इन्द्रियों के मल दग्ध होकर इन्द्रियाँ ज्ञानयज्ञ को करने में अधिक समर्थ हो जाती हैं।
Subject
सप्त