Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 73

99 Mantra
17/73
Devata- अग्निर्देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ॒जुह्वा॑नः सु॒प्रती॑कः पु॒रस्ता॒दग्ने॒ स्वं योनि॒मासी॑द साधु॒या। अ॒स्मिन्त्स॒धस्थे॒ऽअध्युत्त॑रस्मि॒न् विश्वे॑ देवा॒ यज॑मानश्च सीदत॥७३॥

आ॒जुह्वा॑न॒ इत्या॒जुऽह्वा॑नः। सु॒प्रती॑क॒ इति॑ सु॒ऽप्रती॑कः। पु॒रस्ता॑त्। अग्ने॑। स्वम्। योनि॑म्। आ। सी॒द॒। सा॒धु॒येति॑ साधु॒ऽया। अ॒स्मिन्। स॒धस्थे॑। अधि॑। उत्त॑रस्मिन्। विश्वे॑। दे॒वाः॒। यज॑मानः। च॒। सी॒द॒त॒ ॥७३ ॥

Mantra without Swara
आजुह्वानः सुप्रतीकः पुरस्तादग्ने स्वँयोनिमा सीद साधुया । अस्मिन्त्सस्हस्थेऽअध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ॥

आजुह्वान इत्याजुऽह्वानः। सुप्रतीक इति सुऽप्रतीकः। पुरस्तात्। अग्ने। स्वम्। योनिम्। आ। सीद। साधुयेति साधुऽया। अस्मिन्। सधस्थे। अधि। उत्तरस्मिन्। विश्वे। देवाः। यजमानः। च। सीदत॥७३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की ही प्रेरणा इस मन्त्र में इन शब्दों से दी जा रही है-(आजुह्वान:) = तू सदा दानपूर्वक अदन करनेवाला बन [हु दान - अदन] । आचार्य के शब्दों में 'सत्कारेण आहूतः' तू इस प्रकार से शोभन आचरणवाला हो कि तुझे सब सत्कार से बुलाएँ । २. (सुप्रतीकः) = तू शोभन मुखवाला हो। तेरा चेहरा तेजस्वी हो । ३. (पुरस्तात्) = तू निरन्तर आगे बढ़नेवाला बन। (अग्ने) = प्रगतिशील जीव ! (स्वं योनिम्) = अपने घर में (साधुया) = श्रेष्ठ कर्मों से (आसीद) = आसीन हो । गृहप्रवेश के समय तूने व्रत लिया था कि 'शिवं प्रपद्ये' में कल्याणकर कर्मों को ही करूंगा, अतः तूने घर में कभी अशुभ व्यवहार नहीं करना। ५. (अस्मिन् सधस्थे) = यह घर तुम्हारा मिलकर [सह] रहने का स्थान हो, यहाँ कभी कलह न हों (अधि उत्तरस्मिन्) = इस उत्कृष्ट गृह में (विश्वे देवा:) = घर के सब लोग देव=विद्वान् व उत्तम गुणोंवाले बनकर (सीदत) = बैठो (च) = तथा (यजमानः) = प्रत्येक व्यक्ति यज्ञ के शीलवाला होकर यहाँ निवास करे । 'यजमानः' यह एकवचन इस बात का सूचक है कि सभी अपने-अपने को यज्ञशील बनाने का प्रयत्न करें-दूसरों के सुधार में ही न लगे रहें ।
Essence
भावार्थ- हम आजुह्वान व सुप्रतीक बनकर उन्नति करते हुए घरों में उत्तम कर्मों में आसीन हों। मिलकर चलें, देव बनें, यज्ञशील हों। यज्ञ ही तो हमें बुराइयों से बचाकर 'कुत्स' बनाएगा। यज्ञ से हम बुराइयों को भी भस्म कर देंगें।
Subject
आजुह्वान- सुप्रतीक