Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 72

99 Mantra
17/72
Devata- अग्निर्देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒प॒र्णोऽसि ग॒रुत्मा॑न् पृ॒ष्ठे पृ॑थि॒व्याः सी॑द। भा॒सान्तरि॑क्ष॒मापृ॑ण॒ ज्योति॑षा॒ दिव॒मुत्त॑भान॒ तेज॑सा॒ दिश॒ऽउद्दृ॑ꣳह॥७२॥

सु॒प॒र्णः। अ॒सि॒। ग॒रुत्मा॒निति॑ ग॒रुत्मा॑न्। पृ॒ष्ठे। पृ॒थि॒व्याः। सी॒द॒। भा॒सा। अ॒न्तरि॑क्षम्। आ। पृ॒ण॒। ज्योति॑षा। दिव॑म्। उत्। स्त॒भा॒न॒। तेज॑सा। दिशः॑। उत्। दृ॒ꣳह॒ ॥७२ ॥

Mantra without Swara
सुपर्णासि गरुन्मान्पृष्ठे पृथिव्याः सीद । भासान्तरिक्षमापृण ज्योतिषा दिवमुत्तभान तेजसा दिशऽउद्दृँह ॥

सुपर्णः। असि। गरुत्मानिति गरुत्मान्। पृष्ठे। पृथिव्याः। सीद। भासा। अन्तरिक्षम्। आ। पृण। ज्योतिषा। दिवम्। उत्। स्तभान। तेजसा। दिशः। उत्। दृꣳह॥७२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के उपासक को प्रेरणा देते हुए प्रभु कहते हैं कि (सुपर्णः असि) = [शोभनानि पर्णानि पूर्णानि शुभलक्षणानि यस्य - द०] तू अच्छे-अच्छे पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त है। २. (गरुत्मान्) = [गुर्वात्मा - द०] बड़े मन व आत्मा के बल से युक्त है। ३. (पृथिव्याः पृष्ठे सीद) = इस शरीररूप पृथिवी के पृष्ठ पर तू आसीन हो, अर्थात् शरीर पर तेरा पूर्ण आधिपत्य हो, यह तेरे शासन में हो। ४. (भासा) = अपनी दीप्ति से (अन्तरिक्षम्) = अपने हृदयान्तरिक्ष को (आपृण) = [आपूरय-द०] पूरित कर । तेरा हृदय निर्मल हो, चमकता हुआ हो, वहाँ प्रभु का व प्रेम का प्रकाश हो। उसमें ईर्ष्या-द्वेषादि की कुटिलता न हो। ५. (ज्योतिषा) = तू ज्ञान की ज्योति से दिवम् = अपने मस्तिष्करूप द्युलोक को (उत्तभान) = ऊपर (थाम) = उन्नति को पहुँचा । तेरा मस्तिष्क ज्ञान की ज्योति से अधिकाधिक उन्नत होता चले। ६. तेजसा तेजस्विता से (दिशः) = तू चारों दिशाओं को ['य आशानां आशापालाः' अर्थव०, आशा:-दिशा] अपने शरीर के चारों द्वारों को (उद् दृह) = उत्कृष्टता से दृढ़ कर । तेरा [क] मुखद्वार अनिष्ट भोजन को अन्दर न जाने दे और तेरा [ख] मलद्वार मल को बाहर फेंकता हुआ सचमुच 'पायु' रक्षक हो। [ग] तेरा 'शिश्न' [मूत्रद्वार] मूत्र को ही बाहर फेंकनेवाला हो, रेतस् को नहीं और इस प्रकार [घ] तेरा 'विदृतिद्वार' अन्त में तुझे इस ब्रह्म की ओर ले जानेवाला बने। यह ' ब्रह्मरन्ध्र' इस नाम को सार्थक करे।
Essence
भावार्थ- हम सुपर्ण बनें। गरुत्मान् बनकर शरीर पर पूर्ण आधिपत्य प्राप्त करें। हृदय को दीप्त करके मस्तिष्क को ज्ञानोज्ज्वल करें। हमारे इस शरीर दुर्ग के चारों द्वार दृढ़ हों ।
Subject
सुपर्ण