Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 69

99 Mantra
17/69
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विधृतिर्ऋषिः Chhand- भुरिगार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अग्ने॒ प्रेहि॑ प्रथ॒मो दे॑वय॒तां चक्षु॑र्दे॒वाना॑मु॒त मर्त्या॑नाम्। इय॑क्षमाणा॒ भृगु॑भिः स॒जोषाः॒ स्वर्य्यन्तु॒ यज॑मानाः स्व॒स्ति॥६९॥

अग्ने॑। प्र। इ॒हि॒। प्र॒थ॒मः। दे॒व॒य॒तामिति॑ देवऽय॒ताम्। चक्षुः॑। दे॒वाना॑म्। उ॒त। मर्त्या॑नाम्। इय॑क्षमाणाः। भृगु॑भि॒रिति॒ भृगु॒॑ऽभिः। स॒जोषा॒ इति॑ स॒ऽजोषाः॑। स्वः॑। य॒न्तु॒। यज॑मानाः स्व॒स्ति ॥६९ ॥

Mantra without Swara
अग्ने प्रेहि प्रथमो देवयताञ्चक्षुर्देवानामुत मर्त्यानाम् । इयक्षमाणा भृगुभिः सजोषाः स्वर्यन्तु यजमानाः स्वस्ति ॥

अग्ने। प्र। इहि। प्रथमः। देवयतामिति देवऽयताम्। चक्षुः। देवानाम्। उत। मर्त्यानाम्। इयक्षमाणाः। भृगुभिरिति भृगुऽभिः। सजोषा इति सऽजोषाः। स्वः। यन्तु। यजमानाः स्वस्ति॥६९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु जीव से कहते हैं- (अग्ने) = हे अग्रगति को सिद्ध करनेवाले जीव ! तू (प्रेहि) = आगे बढ़। २. (प्रथमः देवयताम्) = दिव्य गुणों की कामना करनेवालों में तू प्रथम बन। ३. इस संसार में तू (देवानाम्) = सूर्य, चन्द्र, तारे, पृथिवी, जल, तेज, वायु आदि सब देवों का (चक्षुः) [चष्टे] = देखनेवाला बन। इनका तत्त्वज्ञान प्राप्त कर । इनका तत्त्वज्ञान ही तुझे इनके ठीक उपयोग से स्वस्थ बनाएगा। ४. (उत) = और (मर्त्यानाम्) = मनुष्यों के भी चक्षुः = व्यवहार को तू सम्यक् देखनेवाला बन। उनकी मनोवृत्ति को समझने पर ही तू सबके साथ उत्तमता से वर्त्तता हुआ व्यर्थ के वैर-विरोध से बचा रहेगा । ५. (इयक्षमाणाः) = [यष्टुम् इच्छन्तः] = यज्ञों के करने की इच्छावाले होते हुए तथा (भृगुभिः सजोषा:) = [भ्रस्ज पाके] उत्तम परिपक्व विद्वानों के साथ प्रीतिपूर्वक ज्ञान चर्चाओं का सेवन करते हुए (यजमाना:) = पूजा-सङ्गतीकरण व दान वृत्तिवाले लोग स्वस्ति = रोग व शोकादि से आहत न होते हुए स्वः यन्तु उस स्वयं देदीप्यमान ज्योति को प्राप्त करें।
Essence
भावार्थ - १. हम अग्नि बनें, आगे बढ़ें, दिव्य गुणों का वर्धन करनेवालों में प्रथम हों । २. प्राकृतिक देवों का ज्ञान प्राप्त करें, जिससे उनके ठीक उपयोग से स्वस्थ हों। मनुष्यों का ज्ञान प्राप्त करें, जिससे उनके स्वभाव को समझकर वर्त्तते हुए झगड़ों में न उलझ जाएँ। ३. यज्ञशील बनकर ज्ञानियों के साथ ज्ञानचर्चाओं का सेवन करते हुए स्वस्थ बनकर प्रभु को प्राप्त होनेवाले हों।
Subject
देवयतां प्रथमः 'भृगुभिः सजोषाः '