Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 62

99 Mantra
17/62
Devata- यज्ञो देवता Rishi- विधृतिर्ऋषिः Chhand- निचृदार्ष्यनुस्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
दे॒व॒हूर्य॒ज्ञऽआ च॑ वक्षत् सुम्न॒हूर्य॒ज्ञऽआ च॑ वक्षत्। यक्ष॑द॒ग्निर्दे॒वो दे॒वाँ२ऽआ च॑ वक्षत्॥६२॥

दे॒व॒हूरिति॑ देव॒ऽहूः। य॒ज्ञः। आ। च॒। व॒क्ष॒त्। सु॒म्न॒हूरिति॑ सुम्न॒ऽहूः। य॒ज्ञः। आ। च॒। व॒क्ष॒त्। यक्ष॑त्। अ॒ग्निः। दे॒वः। दे॒वान्। आ। च॒। व॒क्ष॒त् ॥६२ ॥

Mantra without Swara
देवहूर्यज्ञऽआ च वक्षत्सुम्नहूर्यज्ञ आ च वक्षत् । यक्षदग्निर्देवो देवाँऽआ च वक्षत् ॥

देवहूरिति देवऽहूः। यज्ञः। आ। च। वक्षत्। सुम्नहूरिति सुम्नऽहूः। यज्ञः। आ। च। वक्षत्। यक्षत्। अग्निः। देवः। देवान्। आ। च। वक्षत्॥६२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (यज्ञः) = यज्ञ (देवहू:) = [देवान् वक्षत् ] देवों को पुकारनेवाला है, अर्थात् यज्ञ से हम में दिव्य गुणों की वृद्धि होती है। (च) = वह यज्ञ हमें दिव्य गुणों को (आवक्षत्) = [ आवहतु -म० ] प्राप्त कराए। २. (यज्ञ:) = यहं यज्ञ (सुम्नहूः) = [ सुम्नं ह्वयति] सुख को घर में पुकारनेवाला है। (च) = और यह आवक्षत् सुख को हमारे घरों में प्राप्त करानेवाला है। एवं यज्ञों के दो परिणाम हैं- [क] दिव्य गुणों की वृद्धि तथा [ख] सुखों की प्राप्ति। ३. (अग्निः यक्षत्) = [ यजतु] यह आगे बढ़ने की वृत्तिवाला व्यक्ति यज्ञ करे (च) = और (देवः) = दिव्य गुणों का पुञ्ज प्रभु (देवान् आवक्षत्) = इसे दिव्य गुणों को प्राप्त कराए। इस वाक्य शैली से यह स्पष्ट है कि हम यज्ञ करते हैं और हमें दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है। 'यज्ञ' 'ऋतुओं की अनुकूलता, वायुशुद्धि व नीरोगता' आदि के द्वारा इस लोक के सुखों को देता है, साथ ही लोभ की वृत्ति पर कुठाराघात करता हुआ यह हमारी सब अशुभ वृत्तियों को भी समाप्त करता है और हममें दिव्य गुणों का विकास करता है। दिव्य गुणों का प्रारम्भ 'धृति' से है, अतः मन्त्र का ऋषि 'विधृति' है, विशिष्ट धृतिवाला ।
Essence
भावार्थ - १ यज्ञ हमारे लिए सुखमय स्थिति उत्पन्न करके इस लोक को अच्छा बनाते हैं । २. हमारी अशुभ वृत्तियों को समाप्त करके, दिव्यता को जन्म देकर आमुष्मिक निःश्रेयस के साधक होते हैं।
Subject
देवहूः सुम्नहूः