Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 6

99 Mantra
17/6
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उप॒ ज्मन्नुप॑ वेत॒सेऽव॑तर न॒दीष्वा। अग्ने॑ पि॒त्तम॒पाम॑सि॒ मण्डू॑कि॒ ताभि॒राग॑हि॒ सेमं नो॑ य॒ज्ञं पा॑व॒कव॑र्णꣳ शि॒वं कृ॑धि॥६॥

उप॑। ज्मन्। उप॑। वे॒त॒से। अव॑। त॒र॒। न॒दीषु॑। आ। अग्ने॑। पि॒त्तम्। अ॒पाम्। अ॒सि॒। मण्डू॑कि। ताभिः॑। आ। ग॒हि॒। सा। इ॒मम्। नः॒। य॒ज्ञम्। पा॒व॒कव॑र्ण॒मिति॑ पाव॒कऽव॑र्णम्। शि॒वम्। कृ॒धि॒ ॥६ ॥

Mantra without Swara
उप ज्मन्नुप वेतसेवतर नदीष्वा । अग्ने पित्तमपामसि मण्डूकि ताभिरागहि सेमन्नो यज्ञम्पावकवर्णँ शिवङ्कृधि ॥

उप। ज्मन्। उप। वेतसे। अव। तर। नदीषु। आ। अग्ने। पित्तम्। अपाम्। असि। मण्डूकि। ताभिः। आ। गहि। सा। इमम्। नः। यज्ञम्। पावकवर्णमिति पावकऽवर्णम्। शिवम्। कृधि॥६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की भावना, अर्थात् प्रभु-प्राप्ति के प्रकरण को ही आगे इस रूप में कहते हैं कि उप-उस परमेश्वर के समीप रहता हुआ तू (ज्मन्) = पृथिवी में (अवतर) = अवतीर्ण हो। 'ज्मा' पृथिवी को कहते हैं 'जमतेर्गतिकर्मणः'=गत्यर्थक 'जम' धातु से यह शब्द बना है, अतः अभिप्राय यह है कि जब तू इस पृथिवी पर शरीर धारण करे तो 'गतिशील' बनना । गतिशीलता तो तेरा अध्यात्म स्वभाव ही हो। २. (उप) = उपासना करता हुआ तू (वेतसे) = बेंत में (अवतर) = अवतीर्ण हो । वेतस की भाँति तुझमें नम्रता हो, अकड़ न हो। अथवा 'वयति तन्तून् सन्तनोति' यज्ञतन्तु का तू विस्तार करनेवाला हो। क्रियाशील बन तेरे कर्म यज्ञात्मक हों। इन उत्तम कर्मों से ही तो तू अपनी शक्तियों का भी विस्तार करेगा। ३. (नदीषु) = [नदते: स्तुतिकर्मणः] विविध नामों के उच्चारण द्वारा प्रभु की स्तवन क्रियाओं में तू (आ) = सर्वथा अवतर, अवतीर्ण हो । कर्मों को करते हुए तुझे प्रभु का विस्मरण न हो जाए। ४. हे (अग्ने) = प्रगतिशील जीव ! तू (अपां पित्तम् असि) = कर्मों का तेज है। क्रियाशीलता ने तुझे तेजस्वी बनाया है। सदा कर्म करने से तेरे सब अङ्गों की शक्ति बढ़ी है । ५. अतः हे (मण्डूकि) = उत्तम गुणों से अपने को मण्डित करनेवाले व्यक्ति! (ताभिः) = उन कर्मों से (आगहि) = तू हमें प्राप्त हो । ('स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः') = अपने कर्मों से ही प्रभु की अर्चना करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है । ६. (सः) = वह तू (इमम्) = इस (नः) = हमारे लिए (यज्ञम्) = वेद में प्रतिपादित यज्ञ को, जोकि (पावकवर्णम्) = अग्नि के समान तेजस्वी व (शिवम्) = कल्याणकर है, (कृधि) = कर। यह यज्ञ तुझे तेजस्वी व सुखी करेगा। यज्ञों में निरन्तर प्रवृत्त हुआ तू बुरे कामों से बचा रहेगा, विषय-वासनाओं में न फँसने से तू जहाँ तेजस्वी बनेगा वहाँ औरों का कल्याण सिद्ध करता हुआ अपना भी कल्याण सिद्ध करेगा।
Essence
भावार्थ - १. तू गतिशील, नम्र, यज्ञशील व स्तोता बन। २. कर्मों में लगा रहकर तेजस्वी बन। ३. अपने को सद्गुणों से सुभूषित करके कर्मों द्वारा प्रभु को प्राप्त हो । ४. ये यज्ञ तुझे पावकवर्ण व शिव बनाएँगे।
Subject
अपां पित्तम्