Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 59

99 Mantra
17/59
Devata- आदित्यो देवता Rishi- विश्वावसुर्ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि॒मान॑ऽए॒ष दि॒वो मध्य॑ऽआस्तऽआपप्रि॒वान् रोद॑सीऽअ॒न्तरि॑क्षम्। स वि॒श्वाची॑र॒भिच॑ष्टे घृ॒तीची॑रन्त॒रा पूर्व॒मप॑रं च के॒तुम्॥५९॥

वि॒मान॒ इति॑ वि॒ऽमानः॑। ए॒षः। दि॒वः। मध्ये॑। आ॒स्ते॒। आ॒प॒प्रि॒वानित्या॑ऽपप्रि॒वान्। रोद॑सी॒ इति॒ रोद॑सी। अ॒न्तरि॑क्षम्। सः। वि॒श्वाचीः॑। अ॒भि। च॒ष्टे॒। घृ॒ताचीः॑। अ॒न्त॒रा। पूर्व॑म्। अप॑रम्। च॒। के॒तुम् ॥५९ ॥

Mantra without Swara
विमानऽएष दिवो मध्यऽआस्तऽआपप्रिवान्रोदसीऽअन्तरिक्षम् । स विश्वाचीरभि चष्टे घृताचीरन्तरा पूर्वमपरं च केतुम् ॥

विमान इति विऽमानः। एषः। दिवः। मध्ये। आस्ते। आपप्रिवानित्याऽपप्रिवान्। रोदसी इति रोदसी। अन्तरिक्षम्। सः। विश्वाचीः। अभि। चष्टे। घृताचीः। अन्तरा। पूर्वम्। अपरम्। च। केतुम्॥५९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के अनुसार 'अप्रतिरथ' सब वासनाओं को जीतकर 'सब वसुओं को प्राप्त करनेवाला बनता है' और 'विश्वावसु' हो जाता है। यह 'विश्वावसु' (विमानः) = ‘विशेषेण मिमीते' प्रत्येक क्रिया को बड़ा माप-तोल कर करता है। २. (एषः) = यह विश्वावसु (दिवो मध्ये) = ज्ञान के प्रकाश में (आस्ते) = निवास करता है। ३. (रोदसी) = द्यावापृथिवी को, अर्थात् मस्तिष्क व शरीर को तथा (अन्तरिक्षम्) = अन्तरिक्ष- हृदय को (आपप्रिवान्) = [प्रा पूरणे] न्यूनताओं से रहित करके शक्ति सम्पन्न बनाता है। मस्तिष्क को ज्ञान से, शरीर को शक्ति से तथा हृदयान्तरिक्ष को 'नैर्मल्य' व सत् [सत्य] से पूरण करता है। इसके मस्तिष्क में ज्योति है 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' इसके शरीर में नीरोगता उभरती है 'मृत्योर्मा अमृतं गमय'। इसके हृदय में सत्य है 'असतो मा सद्गमय'। ४. (सः) = वह विश्वावसु (विश्वाची:) = [विश्वं अञ्चन्ति ] सर्वव्यापक प्रभु की ओर ले जानेवाली क्रियाओं को (अभिचष्टे) = देखता है, अर्थात् प्रभु की ओर ले जानेवाली क्रियाओं को ही करता है। (घृताची:) = [घृ क्षरणदीप्तिः] यह उन क्रियाओं को करता है जो उसे शरीर के मल के क्षरण व ज्ञान की दीप्ति की ओर ले जाती हैं, और इस प्रकार यह ५. (अन्तरा) = अपने हृदयदेश में (पूर्वं केतुम्) = उत्कृष्ट ज्ञान को पराविद्या व ब्रह्मविद्या को (च) = तथा (अपरं केतुम्) = अपराविद्या को प्रकृति- ज्ञान को प्राप्त करता है। इस प्रकार यह अपराविद्या से ऐहलौकिक वसु को प्राप्त करता है तो पराविद्या से 'पारलौकिक वसु' को । इस प्रकार दोनों वसुओं को प्राप्त कर यह सचमुच 'विश्वावसु' बन जाता है।
Essence
भावार्थ- 'विश्वावसु' वह है १. जो सब क्रियाओं को माप-तोलकर करता है। २. सदा ज्ञान में निवास करता है। ३. शरीर-मन व मस्तिष्क का पूरण करता है। ४. उन " क्रियाओं को करता है जो इसे प्रभु व ज्ञान की ओर ले जाएँ। ५. अपने हृदय में 'परा व अपरा' विद्या को ज्ञान-विज्ञान को स्थान देता है।
Subject
पूर्व व अपर केतु