Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 57

99 Mantra
17/57
Devata- यज्ञो देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- निचृदार्षी बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
वी॒तꣳ ह॒विः श॑मि॒तꣳ श॑मि॒ता य॒जध्यै॑ तु॒रीयो॑ य॒ज्ञो यत्र॑ ह॒व्यमेति॑। ततो॑ वा॒काऽआ॒शिषो॑ नो जुषन्ताम्॥५७॥

वी॒तम्। ह॒विः। श॒मि॒तम्। श॒मि॒ता। य॒जध्यै॑। तु॒रीयः॑। य॒ज्ञः। यत्र॑। ह॒व्यम्। एति॑। ततः॑। वा॒काः। आ॒शिष॒ इत्या॒ऽऽशिषः॑। नः॒। जु॒ष॒न्ता॒म् ॥५७ ॥

Mantra without Swara
वीतँ हविः शमितँ शमिता यजध्यै तुरीयो यज्ञो यत्र हव्यमेति । ततो वाका आशिषो नो जुषन्ताम् ॥

वीतम्। हविः। शमितम्। शमिता। यजध्यै। तुरीयः। यज्ञः। यत्र। हव्यम्। एति। ततः। वाकाः। आशिष इत्याऽऽशिषः। नः। जुषन्ताम्॥५७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (हविः वीतम्) = गत मन्त्र के 'अध्वर्यन्' = अहिंसा को चाहनेवाले से हवि का ही भक्षण किया गया है। इसने सदा 'हु दानादनयो:' दानपूर्वक ही अदन किया है। सदा यज्ञशेष खानेवाला ही बना है, अथवा पवित्र पदार्थों का ही भक्षण किया है। २. (शमितम्) = सात्त्विक भोजन से इसने अपने मन को शान्त बनाया है । ३. (शमिता) = यह शम को धारण करनेवाला (यजध्यै) [यष्टुम्] = यज्ञों के लिए प्रवृत्त हुआ है। ४. (तुरीयः) = [ तुरीयमस्यास्तीति ] यह चौथे कदमवाला हुआ है, (यत्र) = जहाँ कि (यज्ञः) = वह पूजनीय, सङ्गति व समर्पण के योग्य प्रभु (हव्यम्) = इस अर्पण करनेवालों में उत्तम पुरुष को (एति) = प्राप्त होता है। माण्डूक्य में 'सोयमात्मा चतुष्पात्'=यह आत्मा चतुष्पात् है, ऐसा कहा है। वेद में 'पृथिवी का विजय,' अन्तरिक्ष का विजय, द्युलोक का विजय व स्वयं देदीप्यमान ज्योति की प्राप्ति' इन चार कदमों का वर्णन हुआ है। चौथे कदम में उस 'स्वर्ज्योति' की प्राप्ति होती है । ५. (ततः) = इस ज्योति के प्राप्त होने पर (वाका:) = [ वचनानि ऋग्यजुः सामलक्षणानि - द०] सब ज्ञान की वाणियाँ इसे प्राप्त होती हैं और आशिषः' अभीष्ट अर्थशंसन', अर्थात् उत्तम इच्छाएँ (नः) = हमें (जुषन्ताम्) = सेवन करती हैं, अर्थात् हमारी सब उत्तम कामनाएँ पूर्ण होती हैं। ब्रह्म के प्राप्त होने पर सब ज्ञान प्राप्त हो जाता है और सब कामनाएँ सत्य हो जाती हैं।
Essence
भावार्थ - १. हम सात्त्विक भोजनवाले हों। २. शुभ गुणयुक्त, ३. यज्ञशील हों । ४. परमात्मा-प्राप्तिरूपं चौथे कदम को रखनेवाले बनें। ५. जिससे हम ज्ञानी व सत्य कामनाओंवाले हों ।
Subject
सात्त्विक अन्तः शान्ति