Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 56

99 Mantra
17/56
Devata- अग्निर्देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- विराडार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दैव्या॑य ध॒र्त्रे जोष्ट्रे॑ देव॒श्रीः श्रीम॑नाः श॒तप॑याः। प॒रि॒गृह्य॑ दे॒वा य॒ज्ञमा॑यन् दे॒वा दे॒वेभ्यो॑ऽअध्व॒र्यन्तो॑ऽअस्थुः॥५६॥

दैव्या॑य। ध॒र्त्रे। जोष्ट्रे॑। दे॒व॒श्रीरिति॑ देव॒ऽश्रीः। श्रीम॑ना॒ इति॒ श्रीऽम॑नाः। श॒तप॑या॒ इति॑ श॒तऽप॑याः। प॒रि॒गृह्येति॑ परि॒ऽगृह्य॑। दे॒वाः। य॒ज्ञम्। आ॒य॒न्। दे॒वाः। दे॒वेभ्यः॑। अ॒ध्व॒र्यन्तः॑। अ॒स्थुः॒ ॥५६ ॥

Mantra without Swara
दैव्याय धर्त्रे जोष्ट्रे देवश्रीः श्रीमनाः शतपयाः । परिगृह्य देवा यज्ञमायन्देवा देवेभ्योऽअध्वर्यन्तो अस्थुः ॥

दैव्याय। धर्त्रे। जोष्ट्रे। देवश्रीरिति देवऽश्रीः। श्रीमना इति श्रीऽमनाः। शतपया इति शतऽपयाः। परिगृह्येति परिऽगृह्य। देवाः। यज्ञम्। आयन्। देवाः। देवेभ्यः। अध्वर्यन्तः। अस्थुः॥५६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र की समाप्ति 'प्रभु के साथ सङ्गतीकरण' पर थी। इसी बात से इस मन्त्र को प्रारम्भ करते हुए कहते हैं कि दैव्याय देवों का हित करनेवाले, (धर्त्रे) = सबका धारण करनेवाले तथा जोष्ट्रे पिता के नाते जीवों की अपने पुत्रों की भाँति प्रीतिपूर्वक सेवा करनेवाले प्रभु के लिए [जुषी प्रीतिसेवनयोः] (देवश्रीः) = [देवान् श्रयति] दिव्य गुणों का सेवन करनेवाले बनो। प्रभु दैव्य हैं, देवों का हित करनेवाले हैं। हम भी दिव्य गुणों का धारण करनेवाले बनेंगे और प्रभु से किये जानेवाले हित के पात्र होंगे। २. प्रभु-अर्चन के लिए (श्रीमनाः) [ श्रयषां श्री : = सेवनम् ] = सेवा की मनोवृत्तिवाला बनता है, प्रभु भी तो 'धर्त्रे' सबका धारण करनेवाले हैं, यह भी औरों के धारण का प्रयत्न करता है। ३. प्रभु (जोष्ट्रे) = सभी का प्रीतिपूर्वक सेवन कर रहे हैं, यह भी 'शतपया: 'सैकड़ों आप्यायनों=वर्धनोंवाला बनता है। अपना आप्ययन करता हुआ यह औरों का भी आप्यायन करता है। ४. इस प्रकार दिव्य गुणों को (परिगृह्य) = ग्रहण करके (देवा:) = ये देववृत्तिवाले लोग (यज्ञम्) = यज्ञ को (आयन्) = प्राप्त होते हैं। सदा यज्ञों में प्रवृत्त होते हैं । ५. ये (देवाः) = देव (देवेभ्यः) = देवों के लिए, अर्थात् अपने में निरन्तर दिव्य गुणों की वृद्धि के लिए (अध्वर्यन्तः) = [अध्वरम हिंसा कर्तुमिच्छन्तः] अंहिसा को चाहते हुए (अस्थुः) = ठहरते हैं। 'अहिंसा' ही अन्य सब यम-नियमों के मूल में है । ये अहिंसा ही हमें 'देवश्रीः- श्रीमना ः- व शतपयाः' बनाएगी ।
Essence
भावार्थ - १. हम दिव्य गुणों का आश्रय करके "दैव्य" प्रभु के हित के पात्र बनें। २. हम श्रीमनाः सेवावृत्तिवाले बनकर औरों का धारण करते हुए धर्ता " प्रभु का अर्चन करें । ३. औरों की सेवा के लिए सैकड़ों आप्यायनोंवाले बनें और इस प्रकार प्रेम से सबका भला करते हुए 'जोष्ट्रे' प्रभु की पद-पद्धति पर चलें। ४. यज्ञशील हों। ५. दिव्य गुणों की वृद्धि के लिए 'अहिंसा' को मौलिक आधार बनाएँ।
Subject
देवश्रीः-श्रीमनाः-शतपयाः