Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 55

99 Mantra
17/55
Devata- अग्निर्देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- भुरिगार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
समि॑द्धेऽअ॒ग्नावधि॑ मामहा॒नऽउ॒क्थप॑त्र॒ऽईड्यो॑ गृभी॒तः। त॒प्तं घ॒र्म्मं प॑रि॒गृह्या॑यजन्तो॒र्जा यद्य॒ज्ञमय॑जन्त दे॒वाः॥५५॥

समि॑द्ध॒ इति॒ सम्ऽइ॑द्धे। अ॒ग्नौ। अधि॑। मा॒म॒हा॒नः। म॒म॒हा॒न इति॑ ममहा॒नः। उ॒क्थप॑त्र॒ इत्यु॒क्थऽप॑त्रः। ईड्यः॑। गृ॒भी॒तः। त॒प्तम्। घ॒र्म्मम्। प॒रि॒गृह्येति॑ परि॒ऽगृह्य॑। अ॒य॒ज॒न्त॒। ऊ॒र्जा। यत्। य॒ज्ञम्। अय॑जन्त। दे॒वाः ॥५५ ॥

Mantra without Swara
समिद्धेऽअग्नावधि मामहानऽउक्थपत्रऽईड्यो गृभीतः । तप्तङ्घर्मम्परिगृह्यायजन्तोर्जा यद्यज्ञमयजन्त देवाः ॥

समिद्ध इति सम्ऽइद्धे। अग्नौ। अधि। मामहानः। ममहान इति ममहानः। उक्थपत्र इत्युक्थऽपत्रः। ईड्यः। गृभीतः। तप्तम्। घर्म्मम्। परिगृह्येति परिऽगृह्य। अयजन्त। ऊर्जा। यत्। यज्ञम्। अयजन्त। देवाः॥५५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र की समाप्ति पर यज्ञों के खूब होने की बात कही है। उसी से प्रस्तुत मन्त्र को प्रारम्भ करते हुए कहते हैं कि अप्रतिरथ (समिद्धे अग्नौ) = खूब दीप्त अग्नि में, यज्ञों के द्वारा उस प्रभु की (अधि-मामहानः) = [ उपरिभावेन देवानामत्यर्थं पूजक :- उ० ] अतिशयेन पूजा करता है। यज्ञों के द्वारा श्रेष्ठतम कर्मों के द्वारा ही वस्तुतः प्रभु की उपासना होती है। हम यज्ञों को अपनाकर प्रभु के निर्देश का पालन करते हैं। २. (उक्थपत्रः) = [उक्थानि पत्रं वाहनं यस्य] यह प्रभु के स्तुतिपरक मन्त्रों को ही अपना वाहन बनाता है। उनपर आरूढ़ होकर यह अपनी जीवन-यात्रा को पूरा करता है। यह प्रभु का स्मरण करता है और जीवन-संग्राम को जारी रखता है। ३. (ईड्य:) = [ईड् = स्तुति, तत्र साधु] स्तुति में उत्तम होता है? इसका प्रभु-स्तवन आडम्बरमात्र न होकर वास्तविक होता है। यह स्तुति से अपने सामने एक लक्ष्य-दृष्टि को उपस्थित करता है। ४. (गृभीतः) = [गृभीतं ग्रहणमस्यास्ति इति - द० ] यह ज्ञान के ग्रहणवाला होता है अथवा मनरूप लगाम को सम्यक्तया पकड़े हुए होता है। ५. ये मन को वश में करनेवाले लोग (तप्तं घर्मम्) = [ तप्= दीप्तौ] खूब दीप्त शक्ति को [ घर्म = शक्ति की उष्णता] (परिगृह्य) = ग्रहण करके (अयजन्त) = सर्वथा यज्ञों में प्रवृत्त होते हैं। इनका ज्ञान [तप्तं] व इनकी शक्ति [घर्म] दोनों यज्ञों का साधन बनते हैं । ६. (यत्) = जब-तब (देवाः) = ये ज्ञानदीप्त लोग ऊर्जा-बल व प्राणशक्ति के हेतु से (यज्ञम्) = उस यजनीय प्रभु को [यज्ञो वै विष्णुः] (अयजन्त) = अपने साथ सङ्गत करते हैं। इस प्रभु सङ्ग से ही ये अपने अन्दर शक्ति को भरनेवाले होते हैं।
Essence
भावार्थ - १. यज्ञों द्वारा प्रभु-पूजन होता है । २. प्रभु-स्तवन ही जीवन-यात्रा में वाहन बने। ३. हम उत्तम स्तुति करनेवाले बनें। ४. ज्ञान का ग्रहण करें। ५. ज्ञान- दीप्त शक्ति प्राप्त करके यज्ञशील हों। ६. प्रभु के मेल से अपने में शक्ति का सञ्चार करें।
Subject
तप्त धर्म