Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 54

99 Mantra
17/54
Devata- दिग् देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- स्वराडार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पञ्च॒ दिशो॒ दैवी॑र्य॒ज्ञम॑वन्तु दे॒वीरपाम॑तिं दुर्म॒तिं बाध॑मानाः। रा॒यस्पो॑षे य॒ज्ञप॑तिमा॒भज॑न्ती रा॒यस्पोषे॒ऽअधि॑ य॒ज्ञोऽअ॑स्थात्॥५४॥

पञ्च॑। दिशः॑। दैवीः॑। य॒ज्ञम्। अ॒व॒न्तु॒। दे॒वीः। अप॑। अम॑तिम्। दु॒र्म॒तिमिति॑ दुःऽम॒तिम्। बाध॑मानाः। रा॒यः। पोषे॑। य॒ज्ञप॑ति॒मिति॑ य॒ज्ञऽप॑तिम्। आ॒भज॑न्ती॒रित्या॒ऽभज॑न्तीः। रा॒यः। पोषे॑। अधि॑। य॒ज्ञः। अ॒स्था॒त् ॥५४ ॥

Mantra without Swara
पञ्च दिशो दैवीर्यज्ञमवन्तु देवीरपामतिं दुर्मतिन्बाधमानाः । रायस्पोषे यज्ञपतिमाभजन्ती रायस्पोषेऽअधि यज्ञोऽअस्थात् ॥

पञ्च। दिशः। दैवीः। यज्ञम्। अवन्तु। देवीः। अप। अमतिम्। दुर्मतिमिति दुःऽमतिम्। बाधमानाः। रायः। पोषे। यज्ञपतिमिति यज्ञऽपतिम्। आभजन्तीरित्याऽभजन्तीः। रायः। पोषे। अधि। यज्ञः। अस्थात्॥५४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. वैदिक साहित्य में राष्ट्र को पाँच भागों में बाँटा है। 'प्राची, दक्षिणा, प्रतीची, उदीची तथा ऊर्ध्व' इन पाँच दिशाओं के दृष्टिकोण से उनमें रहनेवाले लोगों को भी 'पञ्च दिश:' कहा गया है। । इन पाँचों दिशाओं में रहनेवाले लोग (देवी:) = उस देव के उपासक हैं। ये प्रभु की उपासक प्रजाएँ (यज्ञम् अवन्तु) = यज्ञ की रक्षा करें। इनका जीवन यज्ञमय हो । २. (देवी:) = ये ज्ञान के प्रकाशवाली दिव्य गुणसम्पन्न प्रजाएँ (अमतिम्) = अमनन व अज्ञान को, अर्थात् तमोगुण को तथा (दुर्मतिम्) = दुष्ट बुद्धि को, अयथार्थ ज्ञान के कारण पाप में प्रवृत्त होनेवाली राजस् बुद्धि को (अपबाधमाना:) = ये अपने से दूर रोकनेवाली हों। ३. ये प्रजाएँ (रायस्पोषे) = धन का पोषण होने पर (यज्ञपतिम्) = सब यज्ञों के पति उस प्रभु की (आभजन्ती:) = उपासना करेनवाली हों। उन यज्ञों को प्रभु से होता हुआ ये अनुभव करें। उन यज्ञों का इन्हें अहंकार न हो जाए और न ही धन कमाने का अहंकार हो । वे धन को प्रभु का ही समझें, अपने को ट्रस्टी मात्र। ४. और (रायस्पोषे) = धन का पोषण होने पर (यज्ञः) = यज्ञ इनके घरों में (अधि अस्थात्) = आधिक्येन स्थित हो । धन की वृद्धि यज्ञियवृत्ति की कमी का कारण न बन जाए। प्राय: सांसारिक ऐश्वर्य की वृद्धि संसार के विलास का कारण बन जाती है। हममें तो यह श्रेष्ठतम कर्मों की वृद्धि का ही कारण बने।
Essence
भावार्थ - १. हमारे राष्ट्र के सब लोग परमेश्वर के उपासक हों। २. यज्ञ की रक्षा करें। ३. प्रकाशमय जीवनवाले होकर तमोगुण व रजोगुण से ऊपर उठें। ४. धन की वृद्धि होने पर यज्ञपति प्रभु की उपासना से दूर न हो जाएँ। ५. धनी होकर अधिक यज्ञिय वृत्तिवाले हों।
Subject
अमति-दुर्मतिबाधनम्