Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 51

99 Mantra
17/51
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- आर्ष्यनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इन्द्रे॒मं प्र॑त॒रां न॑य सजा॒ताना॑मसद्व॒शी। समे॑नं॒ वर्चसा सृज दे॒वानां॑ भाग॒दाऽअ॑सत्॥५१॥

इन्द्रः॑। इ॒मम्। प्र॒त॒रामिति॑ प्रऽत॒राम्। न॒य॒। स॒जा॒ताना॒मिति॑ सऽजा॒ताना॑म्। अ॒स॒त्। व॒शी। सम्। ए॒न॒म्। वर्च॑सा। सृ॒ज॒। दे॒वाना॑म्। भा॒ग॒दा इति॑ भाग॒ऽदाः। अ॒स॒त् ॥५१ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रेमम्प्रतरान्नय सजातानामसद्वशी । समेनँवर्चसा सृज देवानाम्भागदाऽअसत् ॥

इन्द्रः। इमम्। प्रतरामिति प्रऽतराम्। नय। सजातानामिति सऽजातानाम्। असत्। वशी। सम्। एनम्। वर्चसा। सृज। देवानाम्। भागदा इति भागऽदाः। असत्॥५१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (इन्द्र) = सम्पूर्ण शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो! (इमम्) = इस अपने उपासक को (प्रतरां नय) = [अतिप्रकर्षः प्रतराम्] प्रकृष्ट ऐश्वर्य प्राप्त कराइए। यह प्राकृतिक भोगों से ऊपर उठकर ब्रह्मदर्शन का आनन्द प्राप्त करनेवाला हो। बाह्य समृद्धि के स्थान में यह आत्म-सम्पत्ति को प्राप्त करनेवाला बने । २. (सजातानाम्) = अपने साथ ही उत्पन्न हुए हुए काम, क्रोध, लोभ आदि भावों का यह वशी= वश में करनेवाला हो, अर्थात् कामादि की प्रबलता न होने देकर यह उनका उचित प्रयोग करनेवाला बने। इसका काम [चाह] इसके वेदाध्ययन का कारण बने। इसका क्रोध बुराई को दूर भगाने के लिए हो। इसका लोभ अधिक-से-अधिक यज्ञों के कर सकने का हो, इन यज्ञों के द्वारा प्रभु-प्राप्ति के लिए इसमें प्रबल तृष्णा-पिपासा हो । ३. इस प्रकार (एनम्) = कामादि को वशीभूत करनेवाले इसे (वर्चसा) = वर्चस्= शक्ति से (संसृज) = संसृष्ट कीजिए । कामादि वासनाएँ ही इसकी शक्ति को क्षीण करनेवाली थीं। उनको वश में करके यह शक्ति को पूर्णरूप से सुरक्षित कर सका है। ४. शक्तिशाली बनकर यह (देवानाम्) = देवों का (भागदा) = अंश को देनेवाला (असत्) = हो । देवांश को अलग करके यह सदा यज्ञशेष को खानेवाला हो।
Essence
भावार्थ - १. हम उत्कृष्ट अध्यात्म- सम्पत्ति को प्राप्त करें । २. काम, क्रोध आदि सहज भावों को वशीभूत करनेवाले हों। ३. 'अक्षीण वर्चस्' बनें। ४. यज्ञशेष का सेवन करनेवाले हों।
Subject
वशित्व