Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 44

99 Mantra
17/44
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- विराडार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒मीषां॑ चि॒त्तं प्र॑तिलो॒भय॑न्ती गृहा॒णाङ्गा॑न्यप्वे॒ परे॑हि। अ॒भि प्रेहि॒ निर्द॑ह हृ॒त्सु शोकै॑र॒न्धेना॒मित्रा॒स्तम॑सा सचन्ताम्॥४४॥

अ॒मीषा॑म्। चि॒त्तम्। प्र॒ति॒लो॒भय॒न्तीति॑ प्रतिऽलो॒भय॑न्ती। गृ॒हा॒ण। अङ्गा॑नि। अ॒प्वे॒। परा॑। इ॒हि॒। अ॒भि। प्र। इ॒हि॒। निः। द॒ह॒। हृ॒त्स्विति॑ हृ॒त्ऽसु। शोकैः॑। अ॒न्धेन॑। अ॒मित्राः॑। तम॑सा। स॒च॒न्ता॒म् ॥४४ ॥

Mantra without Swara
अमीषाञ्चित्तम्प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्यप्वे परेहि । अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम् ॥

अमीषाम्। चित्तम्। प्रतिलोभयन्तीति प्रतिऽलोभयन्ती। गृहाण। अङ्गानि। अप्वे। परा। इहि। अभि। प्र। इहि। निः। दह। हृत्स्विति हृत्ऽसु। शोकैः। अन्धेन। अमित्राः। तमसा। सचन्ताम्॥४४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. लोभ की प्रवृत्ति बड़ी विचित्र है [क] यह कम-से-कम प्रयत्न से अधिक-सेअधिक लेना चाहती है। [ख] यह प्रवृत्ति आवश्यकता को नहीं देखती। इससे धन के प्रति एक प्रेम-सा होता है जिसके कारण लोभी किसी अन्य बन्धु बान्धव या प्राणी से प्रेम नहीं कर पाता। २. इतना ही नहीं यह किसी अन्य की सम्पत्ति को देखकर जलता है । एवं, लोभ ईर्ष्या का जनक होता है। मन्त्र में कहते हैं कि (अप्वे) = हे [आप्= प्राप्त करना] अधिक-औरअधिक प्राप्त करने की इच्छा ! तू (अमीषाम्) = इन तेरे शिकार बने हुए लोगों के (चित्तम्) = चित्त को (प्रतिलोभयन्ती) = प्रत्येक ऐश्वर्य के प्रति लुब्ध करती हुई (अङ्गानि गृहाण) = इनके अङ्गों को जकड़ ले, इनको अपने वश में कर ले। लोभाविष्ट हुआ मनुष्य इस प्रकार धन का दास बन जाता है कि उसे धन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सूझता । यह धन के लिए अपने आराम को समाप्त कर देता है। यह धन के लिए अपने बन्धुत्व की बलि दे देता है, आत्मा-परमात्मा के स्मरण का तो प्रश्न ही नहीं रहता। एक ही इच्छा उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गों को जकड़े रखती है और वह है 'धन की इच्छा।' २. यह धन की इच्छा हमारा तो पीछा छोड़ दे। हे अप्वे ! (परा इहि) = तू हमसे परे जा। ३. जो (अमित्रा:) = किसी से स्नेह न करनेवाले लोग हैं उनको अभि प्र इहि लक्ष्य करके तू ख़ूब गतिशील हो, अर्थात् उनको तू प्राप्त कर। ४. उनको ही तू (हृत्सु) = हृदयों में (शोकैः) = शोकाग्नियों से (निर्दह) = नितरां जलानेवाली बन। लोभी, ईर्ष्यालु पुरुषों के ही मन जलते रहें। हे अप्वे ! हमपर तो तू कृपा कर और हमें जलानेवाली न हो। ५. (अमित्रः) = प्राणियों के प्रति स्नेहशून्य हृदयवाले लोग ही (अन्धेन तमसा) = इस अन्धी इच्छा से (सचन्ताम्) = संयुक्त हों। लोभ के कारण आवश्यकता से अधिक धन की इच्छा अन्धी तो है ही। यह साध्य व साधन का विचार न करती हुई साधन को ही साध्य समझ लेती है और परिणामतः धन की ही उपासना करने लगती है। अर्थसक्त को मनु के शब्दों मे 'धर्मज्ञान' नहीं हो पाता, अतः हे अप्वे ! धनाहरणाभिलाष ! तू कृपा करके हमसे दूर रह ।
Essence
भावार्थ- हम लोभ की भावना से ऊपर उठें, जिससे हृदयों में शोकाग्नि से सन्तप्त न होते रहें।
Subject
लोभ का परिणाम