Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 42

99 Mantra
17/42
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- विराडार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उद्ध॑र्षय मघव॒न्नायु॑धा॒न्युत्सत्व॑नां माम॒कानां॒ मना॑सि। उद् वृ॑त्रहन् वा॒जिनां॒ वाजि॑ना॒न्युद्रथा॑नां॒ जय॑तां यन्तु॒ घोषाः॑॥४२॥

उत्। ह॒र्ष॒य॒। म॒घ॒व॒न्निति॑ मघऽवन्। आयु॑धानि। उत्। सत्व॑नाम्। मा॒म॒काना॑म्। मना॑सि। उत्। वृ॒त्र॒ह॒न्निति॑ वृत्रऽहन्। वा॒जिना॑म्। वाजि॑नानि। उत्। रथा॑नाम्। जय॑ताम्। य॒न्तु॒। घोषाः॑ ॥४२ ॥

Mantra without Swara
उद्धर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्वनाम्मामकानां मनाँसि । उद्वृत्रहन्वाजिनाँवाजिनान्युद्रथानाञ्जयताँयन्तव घोषाः ॥

उत्। हर्षय। मघवन्निति मघऽवन्। आयुधानि। उत्। सत्वनाम्। मामकानाम्। मनासि। उत्। वृत्रहन्निति वृत्रऽहन्। वाजिनाम्। वाजिनानि। उत्। रथानाम्। जयताम्। यन्तु। घोषाः॥४२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. विजय के लिए अस्त्रों का ठीक होना अत्यन्त आवश्यक है। अध्यात्म संग्राम के अस्त्र - ' शरीररूप रथ, इन्द्रिरूप घोड़े तथा बुद्धिरूपी सारथि जिसने कि मनरूप लगाम को पूर्णरूप से हाथ में ग्रहण किया हुआ है'- ही तो हैं, अतः मन्त्र में कहते हैं कि २. हे (मघवन्) = उच्च ऐश्वर्य को प्राप्त करनेवाले व [मा+अघ] पापरूप मैल को दूर रखनेवाले (वृत्रहन्) = सब प्रकार की वासनाओं का विनाश करनेवाले 'अप्रतिरथ' ! तू (आयुधानि) = इन शरीर, इन्द्रियादिक आयुधों को उद्हर्षय खूब दीप्त करनेवाला बन। ३. प्रभु जीव से कहते हैं कि (मामकानाम्) = जो मेरे बने रहते हैं, अर्थात् प्रकृति के भोगों में नहीं फँस जाते उन (सत्वनाम्) = सत्त्वगुण प्रधान मेरे भक्तों के (मनांसि) = 'मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार व हृदय' (उत्) = उत्कृष्ट बनें। वस्तुतः मनों के उत्कर्ष का मार्ग प्रभु-भक्त बने रहना ही है। इसके उपासक का हृदय वासनाक्रान्त नहीं होता । ४. हे (वृत्रहन्) = वासना का हनन करनेवाले जीव ! (वाजिनाम्) = तेरे इन्द्रियरूप घोड़ों के (वाजिनानि) = वेग व बल (उत्) = उत्कृष्ट हों। वृत्र ही इन इन्द्रियरूप घोड़ों के वेग का विनाशक है। वासना इन्हें क्षीण-शक्ति कर देती है । ५. आगे बढ़ते हुए (जयताम्) = विजयशील बनते हुए (रथानाम्) = शरीररूप रथों के (घोषाः) = विजयघोष (उत्) = ऊपर उठें। ये शरीररूप रथ पूर्ण स्वस्थ हों, जिससे जीवन-यात्रा अधूरी न रह जाए।
Essence
भावार्थ- जीवन संग्राम में विजय के लिए हमारे मन, इन्द्रिय व शरीररूप सब आयुध ठीक हों ।
Subject
आयुध-दीपन