Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 41

99 Mantra
17/41
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॑स्य॒ वृष्णो॒ व॑रुणस्य॒ राज्ञ॑ऽआदि॒त्यानां॑ म॒रुता॒ शर्द्ध॑ऽउ॒ग्रम्। म॒हाम॑नसां भुवनच्य॒वानां॒ घोषो॑ दे॒वानां॒ जय॑ता॒मुद॑स्थात्॥४१॥

इन्द्र॑स्य। वृष्णः॑। वरु॑णस्य। राज्ञः॑। आ॒दि॒त्याना॑म्। म॒रुता॑म्। शर्द्धः॑। उ॒ग्रम्। म॒हाम॑नसा॒मिति॑ म॒हाऽम॑नसाम्। भु॒व॒न॒च्य॒वाना॒मिति॑ भुवनऽच्य॒वाना॑म्। घोषः॑। दे॒वाना॑म्। जय॑ताम्। उत्। अ॒स्था॒त् ॥४१ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानाम्मरुताँ शर्धऽउग्रम् । महामनसाम्भुवनच्यवानाङ्घोषो देवानाञ्जयतामुदस्थात् ॥

इन्द्रस्य। वृष्णः। वरुणस्य। राज्ञः। आदित्यानाम्। मरुताम्। शर्द्धः। उग्रम्। महामनसामिति महाऽमनसाम्। भुवनच्यवानामिति भुवनऽच्यवानाम्। घोषः। देवानाम्। जयताम्। उत्। अस्थात्॥४१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की विजयशील देवसेनाओं के जयघोष का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि (वृष्णः इन्द्रस्य) = शक्तिशाली व औरों पर सुखों की वर्षा करनेवाले इन्द्रियों के अधिष्ठाता इस इन्द्र का तथा २. (वरुणस्य राज्ञः) = अति नियमित जीवनवाले [well regulated] वरुण का, जिसने कि सब बुराइयों का वारण किया है ३. तथा, (आदित्यानां मरुताम्) = अपने अन्दर निरन्तर उत्तमताओं का ग्रहण करनेवाले [आदानात् आदित्यः] प्राणसाधक मरुतों का [मरुतः प्राणाः] (शर्द्ध:) = बल (उग्रम्) = बड़ा उत्कृष्ट व तीव्र होता है। ४ इन्द्र, वरुण व आदित्य ही देवताओं के महारथी हैं। 'जितेन्द्रिय बनना, बुराइयों को रोकना, तथा अच्छाइयों को अपने अन्दर लेते चलना' ये ही बातें हैं जो हममें दैवी सम्पत्ति का वर्धन करेंगी । ५. इन महारथियों का अनुगमन करनेवाले (महामनसाम्) = विशाल व उदार मनवाले (भुवनच्यवानाम्) = भुवनों का भी त्याग कर देनेवाले, अर्थात् लोकहित के लिए अपने जीवन [भुवन] का भी त्याग कर सकनेवाले (जयताम्) = सदा विजयी बननेवाले (देवानाम्) = देवताओं का, दैवी सम्पत्ति के प्रार्जयिता पुरुषों का (घोषः) = विजयघोष (उदस्थात्) = हमारे जीवनों से सदा उठे। ६. यहाँ प्रसङ्गवश विशेषणों के रूप में कही गई ये दो बातें ध्यान देने योग्य हैं कि देव 'विशाल मनवाले' तथा 'अधिक-से-अधिक कल्याण करनेवाले' होते हैं।
Essence
भावार्थ- हम 'इन्द्र, वरुण व आदित्य' बनने का प्रयत्न करें। विशाल हृदयवाले हों, अधिक-से-अधिक त्याग की वृत्तिवाले हों।
Subject
जयघोष