Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 40

99 Mantra
17/40
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- विराडार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॑ऽआसां ने॒ता बृह॒स्पति॒र्दक्षि॑णा य॒ज्ञः पु॒रऽए॑तु॒ सोमः॑। दे॒व॒से॒नाना॑मभिभञ्जती॒नां जय॑न्तीनां म॒रुतो॑ य॒न्त्वग्र॑म्॥४०॥

इन्द्रः॑। आ॒सा॒म्। ने॒ता। बृह॒स्पतिः॑। दक्षि॑णा। य॒ज्ञः। पु॒रः। ए॒तु॒। सोमः॑। दे॒व॒से॒नाना॒मिति॑ देवऽसे॒नाना॑म्। अ॒भि॒भ॒ञ्ज॒ती॒नामित्य॑भिऽभञ्जती॒नाम्। जय॑न्तीनाम्। म॒रुतः॑। य॒न्तु॒। अग्र॑म् ॥४० ॥

Mantra without Swara
इन्द्रऽआसान्नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः । देवसेनानामभिभञ्जतीनाञ्जयन्तीनाम्मरुतो यन्त्वग्रम् ॥

इन्द्रः। आसाम्। नेता। बृहस्पतिः। दक्षिणा। यज्ञः। पुरः। एतु। सोमः। देवसेनानामिति देवऽसेनानाम्। अभिभञ्जतीनामित्यभिऽभञ्जतीनाम्। जयन्तीनाम्। मरुतः। यन्तु। अग्रम्॥४०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र में देव सेनाओं की रक्षा का उल्लेख हुआ है। (देवसेनानाम्) = इन देव सेनाओं के (अभिभञ्जतीनाम्) = जो चारों ओर आसुर सेनाओं का विदारण कर रही हैं, (जयन्तीनाम्) = और असुरों पर विजय पाती चलती हैं, उन देव सेनाओं के (अग्रम्) = आगे (मरुतः) = प्राण (यन्तु) = चलें। स्पष्ट है कि ये देव सेनाएँ प्राणों के पीछे चलती हैं। प्राण-साधना ही इस देवसेना को जन्म देती है। प्राणायाम से इन्द्रियों के दोषक्षीण होते हैं, मन का मैल नष्ट होता है और आसुर वृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। एवं, स्पष्ट है कि देवसेनाओं के आगे मरुत् चलते हैं। (इन्द्रः आसां नेता) = इन विजयशील देवसेनाओं का सेनापति इन्द्र है। (इन्द्र) = इन्द्रियों का अधिष्ठाता है, हृषीकेश है, हृषीक = इन्द्रियों का ईश। यह इन्द्र ही तो देवराट् है। यदि जीभ ने चाहा और हमने खाया तब तो धीरे-धीरे हम इन इन्द्रियों के दास ही बन जाएँगे। हम इन्द्र बनकर देवसेनाओं के सेनापति बनें । ३. इस देवसेना के (पुरः) = आगे (एतु) = ये व्यक्ति चलें। कौन? [क] (बृहस्पतिः) = ब्रह्मणस्पति ज्ञान का स्वामी, देवताओं का गुरु-ज्ञानियों का भी ज्ञानी । दिव्य गुणों में ज्ञान का सर्वोच्च स्थान है। ज्ञानाग्नि कामादि वासनाओं को भस्म कर देती है। [ख] (दक्षिणा) = दान। यह दान लोभ का नाश करता है। लोभ व्यसनवृक्ष का मूल है, अतः देव सदा देते हैं [देवो दानात्] [ग] (यज्ञः) = दिव्य गुणों में प्रथम स्थान ज्ञान का, दूसरा दान का तथा तीसरा स्थान यज्ञ का है। ये यज्ञ ही श्रेष्ठतम कर्म हैं। देव सदा 'हविर्भुक्' होते हुए यज्ञशील बनते हैं। [घ] (सोमः) = चौथा देव सोम है, सौम्यता । सारे दिव्य गुणों के होने पर भी यदि यह सौम्यता न हो तो सब दिव्य गुण अदिव्य बन जाते हैं। दैवी सम्पत्ति का चरमोत्कर्ष 'नातिमानिता' में ही तो है। सोम की भावना 'वीर्य शक्ति' भी है। मनुष्य ने देव बनने के लिए इस वीर्य-शक्ति की रक्षा करके सोम का पुञ्ज बनना है। सोमशक्ति की रक्षा ही 'ब्रह्मचर्य' है, यही ब्रह्म-प्राप्ति का मार्ग है।
Essence
भावार्थ- हम प्राण-साधना करें, जिससे हममें दिव्य गुणों का विकास हो । इन्द्रियों के अधिष्ठाता बनकर हम देवसेनाओं के सेनापति बनें। हमारे जीवन में 'ज्ञान-दान यज्ञ-सौम्यता व सोमरक्षा' को महत्त्व प्राप्त हो ।
Subject
देवसेना