Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 39

99 Mantra
17/39
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒भि गो॒त्राणि॒ सह॑सा॒ गाह॑मानोऽद॒यो वी॒रः श॒तम॑न्यु॒रिन्द्रः॑। दु॒श्च्य॒व॒नः पृ॑तना॒षाड॑यु॒ध्योऽअ॒स्माक॒ꣳ सेना॑ अवतु॒ प्र यु॒त्सु॥३९॥

अ॒भि। गो॒त्राणि॑। सह॑सा। गाह॑मानः। अ॒द॒यः। वी॒रः। श॒तम॑न्यु॒रिति॑ श॒तऽम॑न्युः। इन्द्रः॑। दु॒श्च्य॒व॒न इति॑ दुःऽच्यव॒नः। पृ॒त॒ना॒ऽषाट्। अ॒यु॒ध्यः᳕। अ॒स्माक॑म्। सेनाः॑। अ॒व॒तु॒। प्र। यु॒त्स्विति॑ यु॒त्सु ॥३९ ॥

Mantra without Swara
अभि गोत्राणि सहसा गाहमानो दयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः । दुश्च्यवनः पृतनाषाडयुध्यो स्माकँ सेना अवतु प्र युत्सु ॥

अभि। गोत्राणि। सहसा। गाहमानः। अदयः। वीरः। शतमन्युरिति शतऽमन्युः। इन्द्रः। दुश्च्यवन इति दुःऽच्यवनः। पृतनाऽषाट्। अयुध्यः। अस्माकम्। सेनाः। अवतु। प्र। युत्स्विति युत्सु॥३९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (इन्द्रः) = इन्द्रियों का अधिष्ठाता जीव (गोत्राणि) = धनों को (सहसा) = अपनी शक्ति से, अर्थात् अपने पुरुषार्थ से (अभिगाहमान:) = सर्वतः अवगाहन करता हुआ, अर्थात् सुपथों से कमाता हुआ (अदयः) = [देङ् रक्षणे] उनको अपने पास रखनेवाला नहीं होता। कमाता है पर जोड़ता नहीं, उन धनों को दे डालता है। अपने पुरुषार्थ से इतना कमाता है कि धन में लोटता है [rolls in wealth] पर अनासक्ति के कारण उनका दान कर देता है। यह इन्द्र धन को अपने पास न रखकर ही इन्द्र बना रहता है। यह अपनी शक्ति को खोता नहीं, धनासक्ति व्यक्ति को क्षीण-शक्ति कर देती है, 'कुबेर' बना देती है, कुत्सित शरीरवाला । २. (वीरः) = यह दानवीर इन्द्र धन के दान के कारण सचमुच वीर शक्तिशाली बना रहता है। ३. (शतमन्युः) = अपने धनों से वह शतशः यज्ञों का करनेवाला होता है। ३. (दुश्च्यवनः) = इसे यज्ञमार्ग से कोई भी बात गिरा नहीं पाती। वस्तुतः धन का लोभ ही इस यज्ञिय मार्ग से विचलित कर सकता था। उसे छोड़कर यह दृढ़ता से यज्ञिय मार्ग पर चल रहा है। ४. (पृतनाषाट्) = इस यज्ञ-मार्ग पर चलते हुए यह काम-क्रोध आदि को संग्राम में पराभूत करनेवाला होता है [पृतनां संग्रामं सहते] ५. (अयुध्यः) = काम-क्रोधादि इसके प्रतियोद्धा नहीं बन पाते । [नास्ति युध्यः अस्य] ६. यह अयुध्य इन्द्र (अस्माकम्) = हमारी दिव्य गुणों की (सेना:) = सेनाओं को (प्रयुत्सु) = इन प्रकृष्ट आध्यात्मिक संग्रामों में (अवतु) = सुरक्षित करे। काम-क्रोधादि का पराजय होकर, प्रेम व मित्रता का विकास हो ।
Essence
भावार्थ- हम धनों का अवगाहन करें, परन्तु उनमें ही आसक्त न हो जाएँ। हममें दिव्य गुणों का विकास हो। लोभ ही दिव्य गुणरूप पुरुषों के लिए तुहिनरूप होता है।
Subject
शतहस्त समाहर सहस्त्रहस्त सं किर