Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 37

99 Mantra
17/37
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ब॒ल॒वि॒ज्ञा॒यः स्थवि॑रः॒ प्रवी॑रः॒ सह॑स्वान् वा॒जी सह॑मानऽउ॒ग्रः। अ॒भिवी॑रोऽअ॒भिस॑त्वा सहो॒जा जैत्र॑मिन्द्र॒ रथ॒माति॑ष्ठ गो॒वित्॥३७॥

ब॒ल॒वि॒ज्ञा॒य इति॑ बलऽविज्ञा॒यः। स्थवि॑रः। प्रवी॑र॒ इति॒ प्रऽवी॑रः। सह॑स्वान्। वा॒जी। सह॑मानः। उ॒ग्रः। अ॒भिवी॑र॒ इत्य॒भिऽवी॑रः। अ॒भिस॒त्वेत्य॒भिऽस॑त्वा। स॒हो॒जा इति॑ सहः॒ऽजाः। जैत्र॑म्। इ॒न्द्र॒। रथ॑म्। आ। ति॒ष्ठ॒। गो॒विदिति॑ गो॒ऽवित् ॥३७ ॥

Mantra without Swara
बलविज्ञाय स्थविरः प्रवीरः सहस्वान्वाजी सहमानऽउग्रः । अभिवीरोऽअभिसत्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित् ॥

बलविज्ञाय इति बलऽविज्ञायः। स्थविरः। प्रवीर इति प्रऽवीरः। सहस्वान्। वाजी। सहमानः। उग्रः। अभिवीर इत्यभिऽवीरः। अभिसत्वेत्यभिऽसत्वा। सहोजा इति सहःऽजाः। जैत्रम्। इन्द्र। रथम्। आ। तिष्ठ। गोविदिति गोऽवित्॥३७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. अप्रतिरथ वह है जो (बलविज्ञायः) = अपने बल के कारण प्रसिद्ध है। २. (स्थविर:) = स्थिरमति=स्थितप्रज्ञ है, विषयों से डाँवाँडोल होनेवाला नहीं है। ३. (प्रवीरः) = प्रकृष्ट वीर है, यह वैषयिक वृत्तियों को विशेषरूपेण कम्पित करनेवाला है [विशेषेण ईरयति] ४. (सहस्वान्) = सहन-शक्तिवाला है। लोगों की अभिशस्तियों [गालियों] से तैश में आजानेवाला नहीं । ५. (वाजी) = बलवाला है अथवा त्याग वृत्तिवाला है [वाज - Sacrifice] ६. (सहमान:) = शत्रुओं का पराभव करनेवाला है अथवा सर्दी-गर्मी आदि को सहने की शक्तिवाला है। ७. (उग्रः) = तेजस्वी है ८. (अभिवीरः) = वीरता की ओर चलनेवाला है और अभिसत्वा-सत्त्वगुण की ओर चलनेवाला है। यह वीरता व ज्ञान [सत्त्वस्य लक्षणं ज्ञानम्] का समन्वय करता है । ९. (सहोजाः) = यह प्रभु के साथ सम्पर्क के कारण ओजस्वी होता है। १०. हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! तू ऐसा बनकर जैत्रं रथम् (आतिष्ठ) = विजयशील रथ पर आरोहण कर, अर्थात् तू कभी वासनाओं से पराजित न हो। इसी अपराजय के लिए तू ११. (गोवित्) = ज्ञान की वाणियों को प्राप्त करनेवाला बन। जब तुझमें वीरता व ज्ञान का समन्वय होगा तभी तेरी निश्चित विजय होगी। १२. यहाँ मन्त्र का प्रारम्भ 'बलविज्ञाय:' से है और समाप्ति 'गोवित्' पर है। वस्तुतः हमें 'बल व ज्ञान' दोनों का ही सम्पादन करना है। यही भावना 'अभिवीर: व अभिसत्वा' शब्द भी दे रहे हैं।
Essence
भावार्थ- हम अपने जीवन में बल और ज्ञान का समन्वय करके विजयी बनें।
Subject
जैत्र रथाधिष्ठान - रथारोहण