Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 33

99 Mantra
17/33
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ॒शुः शिशा॑नो वृष॒भो न भी॒मो घ॑नाघ॒नः क्षोभ॑णश्चर्षणी॒नाम्। सं॒क्रन्द॑नोऽनिमि॒षऽए॑कवी॒रः श॒तꣳ सेना॑ऽअजयत् सा॒कमिन्द्रः॑॥३३॥

आ॒शुः। शिशा॑नः। वृ॒ष॒भः। न। भी॒मः। घ॒ना॒घ॒नः। क्षोभ॑णः। च॒र्ष॒णी॒नाम्। सं॒क्रन्द॑न॒ इति॑ स॒म्ऽक्रन्द॑नः। अ॒नि॒मि॒ष इत्य॑निऽमिषः। ए॒क॒वी॒र इत्ये॑कऽवी॒रः। श॒तम्। सेनाः॑। अ॒ज॒य॒त्। सा॒कम्। इन्द्रः॑ ॥३३ ॥

Mantra without Swara
आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम् । सङ्क्रन्दनो निमिषऽएकवीरः शतँ सेनाऽअजयत्साकमिन्द्रः ॥

आशुः। शिशानः। वृषभः। न। भीमः। घनाघनः। क्षोभणः। चर्षणीनाम्। संक्रन्दन इति सम्ऽक्रन्दनः। अनिमिष इत्यनिऽमिषः। एकवीर इत्येकऽवीरः। शतम्। सेनाः। अजयत्। साकम्। इन्द्रः॥३३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु के उपासक का प्रकरण चल रहा था। 'यह उपासक कैसा बन जाता है। ' प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि (आशुः) = [अश्नुते व्याप्नोति] यह सदा कार्यों में व्यापृत रहता है। 'विश्वकर्मा' की उपासना करके यह 'विश्वकर्मा' क्यों न बनेगा? 'आशु' शब्द में शीघ्रता की भी भावना है। यह शीघ्रता से कार्य करनेवाला होता है। इसमें आलस्य नहीं होता । २. (शिशान:) = [शो तनूकरणे] यह अपनी बुद्धि को खूब ही तीव्र बनाता है। इस तीव्र बुद्धि ने ही तो उसे प्रभु का दर्शन कराना है ('दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:') = प्रभु सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा ही देखे जाते हैं। ३. (वृषभ:) = यह वृषभ के समान शक्तिशाली होता है। ('नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः') = निर्बल से प्रभु की प्राप्ति सम्भव नहीं होती । ४. (न भीमः) = शक्तिशाली होते हुए भी यह भयंकर नहीं होता। अपितु शक्ति के साथ इसमें शान्ति व सौम्यता होती है। सौम्यता शक्ति को अलंकृत करनेवाली है। यह शक्ति से पर-पीड़न न करके पर रक्षण ही करता है। ५. (घनाघनः) = यह काम, क्रोधादि आन्तर शत्रुओं का पूर्णरूपेण हनन करनेवाला होता है। ६. (चर्षणीनां क्षोभणः) = मनुष्यों को उत्तम प्रेरणा देकर उनमें अध्यात्म-संग्राम के लिए हलचल उत्पन्न कर देता है। वे कामादि शत्रुओं से युद्ध के लिए सन्नद्ध हो जाते हैं। ७. (संक्रन्दनः) = यह सदा प्रभु का आह्वान करनेवाला होता है। प्रभु के नामों का उच्चारण इसे कामादि शत्रुओं के आक्रमण से बचाता है। ८. (अनिमिषः) = यह एक पलक भी नहीं मारता । सदा जागरित- सावधान रहता है। ज़रा-सा प्रमाद किया तो वासनाओं का शिकार हुआ। ९. (एकवीरः) = इन 'प्रद्युम्न' प्रकृष्ट बलवाली वासनाओं से संग्राम करनेवाला यह अद्वितीय वीर है। १०. (इन्द्रः) = यह सब इन्द्रियों को वासनाओं के आक्रमण से बचाकर उनका सच्चा अधिपति बनता है। ११. (शतं सेनाः साकम् अजयत्) = और अब वासनाओं की एक साथ आई हुई सैकड़ों सेनाओं भी को जीत लेता है। अथवा (साकम्) = उस प्रभु के साथ रहनेवाला यह 'अप्रतिरथ' (शतं सेना: अजयत्) = वासनाओं की शतशः सेनाओं को भी जीत लेता है। प्रभु की शक्ति से शक्ति सम्पन्न बने हुए इसको कामादि की सेनाएँ पराजित नहीं कर पातीं।
Essence
भावार्थ- मन्त्र - वर्णित लक्षणों को अपने में विकसित करके हम सच्चे प्रभु-भक्त प्रमाणित हों।
Subject
शतसेना पराजय