Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 32

99 Mantra
17/32
Devata- विश्वकर्मा देवता Rishi- भुवनपुत्रो विश्वकर्मा ऋषिः Chhand- स्वराडार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वि॒श्वक॑र्मा॒ ह्यज॑निष्ट दे॒वऽआदिद् ग॑न्ध॒र्वोऽअ॑भवद् द्वि॒तीयः॑। तृ॒तीयः॑ पि॒ता ज॑नि॒तौष॑धीनाम॒पां गर्भं॒ व्यदधात् पुरु॒त्रा॥३२॥

वि॒श्वऽक॑र्मा। हि। अज॑निष्ट। दे॒वः। आत्। इत्। ग॒न्ध॒र्वः। अ॒भ॒व॒त्। द्वि॒तीयः॑। तृ॒तीयः॑। पि॒ताः। ज॒नि॒ता। ओष॑धीनाम्। अ॒पाम्। गर्भ॑म्। वि। अ॒द॒धा॒त्। पु॒रु॒त्रेति॑ पुरु॒ऽत्रा ॥३२ ॥

Mantra without Swara
विश्वकर्मा ह्यजनिष्ट देवऽआदिद्गन्धर्वोऽअभवद्द्वितीयः । तृतीयः पिता जनितौषधीनामपाङ्गर्भम्व्यदधात्पुरुत्रा ॥

विश्वऽकर्मा। हि। अजनिष्ट। देवः। आत्। इत्। गन्धर्वः। अभवत्। द्वितीयः। तृतीयः। पिताः। जनिता। ओषधीनाम्। अपाम्। गर्भम्। वि। अदधात्। पुरुत्रेति पुरुऽत्रा॥३२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (विश्वकर्मा) = इस सारे ब्रह्माण्ड को व जीव-शरीरों को उत्पन्न करनेवाले (देवः) = प्रभु ने (हि) = निश्चय से (अजनिष्ट) = सब लोक-लोकान्तरों व जीवों के शरीरों को उत्पन्न किया, लोक-लोकान्तर बनाये और उनमें कर्मानुसार जीवों को शरीर धारण कराये । २. (आत् इत्) = जीवों को उस उस लोक में शरीर देने के बाद विश्वकर्मा अब (द्वितीय:) = दूसरे स्थान को पूरण करनेवाला (गन्धर्वः) = वेदवाणी का धारण करनेवाला (अभवत्) = हुआ, अर्थात् जीवों को जन्म देने के बाद प्रभु ने सबसे प्रथम उन्हें वेदज्ञान दिया। हृदयस्थरूपेण 'अग्नि, वायु, आदित्य व अङ्गिरा' को सम्पूर्ण वेदज्ञान देकर उनके द्वारा सभी को प्रकाशमय जीवनवाला किया। ३. (तृतीयः) = तीसरे स्थान को पूरण करनेवाला यह परमात्मा पिता-सबका रक्षक हुआ। रक्षण के उद्देश्य से ही (ओषधीनां जनिता) = ओषधियों को उत्पन्न करनेवाला हुआ। ४. इस तृतीय वाक्य की रचना व स्थिति से दो बातें स्पष्ट हैं- [क] स्वाध्याय का स्थान भोजन से भी प्रथम है तथा [ख] भोजन के लिए - भोजन के द्वारा शरीर - पालन के लिए प्रभु ने ओषधियों को जन्म दिया है। ये ही मनुष्य के मुख्य भोजन हैं । ५. इन ओषधियों के उत्पादन के लिए प्रभु ने (अपां गर्भम्) = जलों को अपने में धारण करनेवाले (पर्जन्य) = मेघ को उत्पन्न किया, जो मेघ (पुरुत्रा) = पुरुत् त्रायते = बहुतों की रक्षा करता है अथवा पालन व पूरण करता है [पुरु] और रक्षा करता है [त्रा] । इस प्रकार प्रभु की कितनी कृपा है ? उसकी अनन्त कृपा का स्मरण करता हुआ 'भुवनपुत्र विश्वकर्मा' उस प्रभु का स्तवन करता है और तदनुरूप बनने का प्रयत्न करता है। यह भी भुवनों को पवित्र करनेवाला तथा सदा कर्मों में व्याप्त रहनेवाला बनता है। इस प्रभु-उपासन के परिणामरूप वह अनुपम शक्ति प्राप्त करके जीवन संग्राम में विजयी होता है और अगले मन्त्रों का ऋषि 'अप्रतिरथ' = अद्वितीय योद्धा बन जाता है। इस अप्रतिरथ का चित्रण अगले मन्त्रों में द्रष्टव्य है।
Essence
भावार्थ - १. प्रभु सारे लोक-लोकान्तरों को जन्म देते हैं। जीवों को कर्मानुसार शरीर देते हैं । २. शरीर देते ही जीवों को वेदज्ञान देते हैं, जिससे वे प्रकृति के प्रयोग में व परस्पर व्यवहार में ग़लती न करें । ३. उनके शरीरों के रक्षार्थ ओषधियों को जन्म देते हैं । ४. ओषधियों की उत्पत्ति के लिए बादलों की व्यवस्था करते हैं।
Subject
लोक-वेद-ओषधि-पर्जन्य