Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 3

99 Mantra
17/3
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- विराडार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऋ॒तव॑ स्थऽऋता॒वृध॑ऽऋतु॒ष्ठा स्थ॑ऽऋता॒वृधः॑। घृ॒त॒श्च्युतो॑ मधु॒श्च्युतो॑ वि॒राजो॒ नाम॑ काम॒दुघा॒ऽअक्षी॑यमाणाः॥३॥

ऋ॒तवः॑। स्थ॒। ऋ॒ता॒वृधः॑। ऋ॒त॒वृध॒ इत्यृ॑त॒ऽवृधः॑। ऋ॒तु॒ष्ठाः। ऋ॒तु॒स्था इत्यृ॑तु॒ऽस्थाः। स्थ॒। ऋ॒ता॒वृधः॑। ऋ॒त॒वृध॒ इत्यृ॑त॒ऽवृधः॑। घृ॒त॒श्च्युत॒ इति॑ घृत॒ऽश्च्युतः॑। म॒धु॒श्च्युत॒ इति॑ मधु॒ऽश्च्युतः॑। वि॒राज॒ इति॑ वि॒ऽराजः॑। नाम॑। का॒म॒दुघा॒ इति॑ काम॒दुघा॑। अक्षी॑यमाणाः ॥३ ॥

Mantra without Swara
ऋतव स्थऽऋतावृधऽऋतुष्ठा स्थ ऋतावृधः । घृतश्च्युतो मधुश्च्युतो विराजो नाम कामदुघाऽअक्षीयमाणाः ॥

ऋतवः। स्थ। ऋतावृधः। ऋतवृध इत्यृतऽवृधः। ऋतुष्ठाः। ऋतुस्था इत्यृतुऽस्थाः। स्थ। ऋतावृधः। ऋतवृध इत्यृतऽवृधः। घृतश्च्युत इति घृतऽश्च्युतः। मधुश्च्युत इति मधुऽश्च्युतः। विराज इति विऽराजः। नाम। कामदुघा इति कामदुघा। अक्षीयमाणाः॥३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में यज्ञ का वर्णन था। उन यज्ञिय स्वभाववाले पुरुषों से कहते हैं कि (ऋतवः स्थ) = तुम अपने जीवन में बड़ी नियमित गतिवाले बनो [ऋ गतौ] । ऋतुएँ जैसे समय पर आती हैं उसी प्रकार तुम अपने सब कार्य समय पर करनेवाले बनो। २. (ऋतावृध:) = इस ऋत से प्रत्येक कार्य को ठीक समय व ठीक स्थान पर करने से बढ़नेवाले बनो। 'ऋत' तुम्हारी वृद्धि का कारण बने । ३. (ऋतुष्ठाः स्थ) = तुम ऋतुओं में स्थित होओ, अर्थात् तुम्हारा आहार-विहार ऋतुओं के अनुकूल हो तथा (ऋतावृधः) = उस-उस ऋतु में किये जानेवाले यज्ञों से अथवा समय-समय पर होनेवाले सत्यानुष्ठान से तुम्हारा वर्धन हो । ४. इस ऋतुचर्या के ठीक पालन से तुम (घृतश्च्युतः) = घृत के स्वामी बनो। तुम्हारे मस्तिष्क में ज्ञान दीप्ति हो । तुम्हारे चेहरे पर स्वाथ्य व ज्ञान की आभा टपकती हो तथा (मधुश्च्युतः) = तुम मधुस्रावी बनो । तुम्हारे व्यवहार में तुम्हारी वाणी से माधुर्य टपकता हो। 'अन्दर ज्ञानाग्नि, बाहर माधुर्यमयी वाणी की शीतलता' ये हो तुम्हारा जीवन। ५. (विराजो नाम) = [विशेषेण राजते, नाम इति प्रसिद्धौ] इस ज्ञान व माधुर्य के कारण तू 'विराज' नाम से प्रसिद्ध हो। अथवा इन्द्रियों को विशेषरूप से शासित करनेवाले के रूप में तुम्हारी प्रसिद्धि हो। ६. (कामदुघाः) = इन्द्रियों को वश में करके काम्य = चाहने योग्य पदार्थों का ही अपने में प्रपूरण करनेवाले तुम बनो। ७. और इस प्रकार अनिष्ट वस्तुओं के सेवन से दूर रहकर तुम (अक्षीयमाणाः) = कभी क्षीणशक्ति न होवो। जीर्णता का मूल अनिष्ट वस्तुओं का स्वादवश सेवन ही है। स्वाद से ऊपर उठकर हम स्वनाश से भी ऊपर उठ जाते हैं।
Essence
भावार्थ- हमारी गति नियमित हो। यज्ञों से हम शक्तियों का वर्धन करें। अनिष्ट पदार्थों के सेवन से शक्तियों का क्षय न होने दें।
Subject
ऋतवः-ऋतुष्ठाः