Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 27

99 Mantra
17/27
Devata- विश्वकर्मा देवता Rishi- भुवनपुत्रो विश्वकर्मा ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो नः॑ पि॒ता ज॑नि॒ता यो वि॑धा॒ता धामा॑नि॒ वेद॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। यो दे॒वानां॑ नाम॒धाऽएक॑ऽए॒व तꣳ स॑म्प्र॒श्नं भुव॑ना यन्त्य॒न्या॥२७॥

यः। नः॒। पि॒ता। ज॒नि॒ता। यः। वि॒धा॒तेति॑ विऽधा॒ता। धामा॑नि। वेद॑। भुव॑नानि। विश्वा॑। यः। दे॒वाना॑म्। ना॒म॒धा इति॑ नाम॒ऽधाः। एकः॑। ए॒व। तम्। स॒म्प्र॒श्नमिति॑ सम्ऽप्र॒श्नम्। भुव॑ना। य॒न्ति॒। अ॒न्या ॥२७ ॥

Mantra without Swara
यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यो देवानान्नामधाऽएक एव तँ सम्प्रश्नम्भुवना यन्त्यन्या ॥

यः। नः। पिता। जनिता। यः। विधातेति विऽधाता। धामानि। वेद। भुवनानि। विश्वा। यः। देवानाम्। नामधा इति नामऽधाः। एकः। एव। तम्। सम्प्रश्नमिति सम्ऽप्रश्नम्। भुवना। यन्ति। अन्या॥२७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (यः) = जो परमात्मा (नः) = हम सबका पिता-पालक, रक्षक है २. (जनिता) = सबका प्रादुर्भाव करनेवाला है। ३. (यः) = जो (विधाता) = कर्मानुसार विविध शरीरों का देनेवाला है। ४. जो (धामानि) = सब तेजों को तथा (विश्वा भुवनानि) = सब पदार्थों के अधिकरणभूत इन सब लोकों को (वेद) = जानता है अथवा [विद् लाभे] प्राप्त कराता है। ५. (यः) = जो (देवानाम्) = सब देवों के (नामधाः) = नाम का धारण करनेवाला है, परन्तु है (एकः एव) = एक ही । 'सूर्य, चन्द्र, वायु, विद्युत्' आदि सब देवों के नाम परमात्मा के भी हैं, इतना ही नहीं मुख्यरूप से ये नाम परमात्मा के ही हैं। वे प्रभु सरति = सारे संसार को गति देते हैं, अत: सूर्य हैं। चन्दति 'आह्लादयति' सबको प्रसन्न करने के कारण, सदा आनन्दमय रहने के कारण प्रभु चन्द्र नामवाले हैं। गति के द्वारा सब बुराइयों का हिंसन करनेवाले ये प्रभु वायु हैं और ज्ञान से विशिष्ट रूप में चमकनेवाले ये प्रभु विद्युत् हैं। ६. (तम्) = उस (संप्रश्नम्) = [ सम्यक् प्रश्न: यस्मिन्] जिज्ञास्य प्रभु को (विश्वा) = सब (अन्या) = दूसरे (भुवना) = लोक-लोकों में रहनेवाले प्राणी (यन्ति) = जाते हैं, सज्जन सर्वदा उसका स्मरण करते हैं, परन्तु दुर्जन भी मुसीबत आने पर उसी के नाम का स्मरण करते हैं। .
Essence
भावार्थ- वे प्रभु सब तेजों व लोकों के देनेवाले हैं। वे प्रभु ही (संप्रश्न) = सम्यग् जिज्ञास्य हैं।
Subject
संप्रश्न