Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 25

99 Mantra
17/25
Devata- विश्वकर्मा देवता Rishi- भुवनपुत्रो विश्वकर्मा ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
चक्षु॑षः पि॒ता मन॑सा॒ हि धीरो॑ घृ॒तमे॑नेऽअजन॒न्नम्न॑माने। य॒देदन्ता॒ऽअद॑दृहन्त॒ पूर्व॒ऽआदिद् द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॑प्रथेताम्॥२५॥

चक्षु॑षः। पि॒ता। मन॑सा। हि। धीरः॑। घृ॒तम्। ए॒न॒ऽइत्ये॑ने। अ॒ज॒न॒त्। नम्न॑माने॒ऽइति॒ नम्न॑माने। य॒दा। इत्। अन्ताः॑। अद॑दृहन्त। पूर्वें॑। आत्। इत्। द्यावा॑पृथि॒वी। अ॒प्र॒थे॒ता॒म् ॥२५ ॥

Mantra without Swara
चक्षुषः पिता मनसा हि धीरो घृतमेनेऽअजनन्नम्नमाने । यदेदन्ताऽअददृहन्त पूर्वऽआदिद्द्यावापृथिवीऽअप्रथेताम् ॥

चक्षुषः। पिता। मनसा। हि। धीरः। घृतम्। एनऽइत्येने। अजनत्। नम्नमानेऽइति नम्नमाने। यदा। इत्। अन्ताः। अददृहन्त। पूर्वें। आत्। इत्। द्यावापृथिवी। अप्रथेताम्॥२५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र का 'उग्र और विहव्य' व्यक्ति (चक्षुषः पिता) = चक्षु आदि इन्द्रियों का पालक बनता है। यह इन्द्रियों को विषयों में भटकने से रोकता है। २. (मनसा हि धीरः) = मन से यह अत्यन्त धैर्यवाला होता है [धैर्यवान् - द०] । ३. इसकी (घृतम्) = तेजस्विता व ज्ञान-दीप्ति (एने) = इसके पृथिवी व द्युलोक को-शरीर व मस्तिष्क को (नम्नमाने) = नम्रतावाला (अजनत्) = करते हैं। इसके शरीर में तेजस्विता के कारण अकड़ नहीं होती, अर्थात् इसके अङ्ग लोच - लचकवाले होते हैं और इसका मस्तिष्क ज्ञान के कारण अकड़ व घमण्ड से रहित होता है। ४. (यदा इत्) = ज्योंही (पूर्वे) = शरीर में प्रथमस्थान में स्थित, अर्थात् अत्यन्त महत्त्वपूर्ण (अन्तः) = अन्त- प्रदेश, आशा-स्थान अददृहन्त दृढ़ हो जाते हैं (आत् इत्) = त्योंही (द्यावापृथिवी अप्रथेताम्) = मस्तिष्क व शरीर दोनों ही विस्तृत शक्तियोंवाले हो जाते हैं । ५. यहाँ ' अन्तः ' शब्द जिन अन्त- प्रदेशों व आशा-स्थानों [आशा-दिशा] का उल्लेख करता है उनका वर्णन अथर्व १ । ३१ । २ । में इस प्रकार हुआ है ('य आशानामाशापालाश्चत्वारः स्थन देवाः । ते नो निर्ऋत्याः पाशेभ्यो मुञ्चतांहसो अंहसः।') = अर्थात् हे देवो! जो तुम दिशाओं के चार दिशा - पालक हो वे तुम हम सबको अवनति के पाशों से तथा हरेक पाप से छुड़ाओ। यहाँ पूर्वद्वार 'मुख' है और इसके सम्मुख पश्चिम द्वार 'गुदा' है। इन दोनों का अभिप्राय यह है कि मुख से कोई भी अपथ्य भोजन व अतिमात्र भोजन प्रवेश न कर सके तथा गुदा से प्रत्येक मलांश का बहिष्करण होता रहे। इसी प्रकार उत्तर द्वार 'विदृति' = ब्रह्मरन्ध्र है और इसके ठीक सुदूर नीचे की ओर दक्षिण द्वार 'शिश्न' है। शिश्न के दृढ़ होने का अभिप्राय यह है कि यह मूत्र का ही त्याग करनेवाला हो, रेतस् का रक्षक हो। ऐसा होने पर ही 'विदृति' द्वार हमारे लिए प्रकाशमय होकर हमारे बन्धन से मोक्ष का कारण बनेगा। ६. इन अन्तों का दृढ़ीकरण आवश्यक है। इनके दृढ़ीकरण के बिना शरीर स्वस्थ नहीं हो पाता और मस्तिष्क की ज्ञानाग्नि बुझी रह जाती है।
Essence
भावार्थ- हम शरीर में चारों अन्तों को दृढ़ करके तेजस्वी व ज्ञान- दीप्त बनें।
Subject
अन्तों की दृढ़ता