Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 21

99 Mantra
17/21
Devata- विश्वकर्मा देवता Rishi- भुवनपुत्रो विश्वकर्मा ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
या ते॒ धामा॑नि पर॒माणि॒ याऽव॒मा या म॑ध्य॒मा वि॑श्वकर्मन्नु॒तेमा। शिक्षा॒ सखि॑भ्यो ह॒विषि॑ स्वधावः स्व॒यं य॑जस्व त॒न्वं वृधा॒नः॥२१॥

या। ते॒। धामा॑नि। प॒र॒माणि॑। या। अ॒व॒मा। या। म॒ध्य॒मा। वि॒श्व॒क॒र्म॒न्निति॑ विश्वऽकर्मन्। उ॒त। इ॒मा। शिक्ष॑। सखि॑भ्य॒ इति॒ सखि॑ऽभ्यः। ह॒विषि॑। स्व॒धा॒व॒ इति॑ स्वधाऽवः। स्व॒यम्। य॒ज॒स्व॒। त॒न्व᳖म्। वृ॒धा॒नः ॥२१ ॥

Mantra without Swara
या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा । शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधावः स्वयँयजस्व तन्वँवृधानः ॥

या। ते। धामानि। परमाणि। या। अवमा। या। मध्यमा। विश्वकर्मन्निति विश्वऽकर्मन्। उत। इमा। शिक्ष। सखिभ्य इति सखिऽभ्यः। हविषि। स्वधाव इति स्वधाऽवः। स्वयम्। यजस्व। तन्वम्। वृधानः॥२१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (विश्वकर्मन्) = सारे संसार के निर्माण करनेवाले ! (स्वधावः) = अपनी धारण शक्तिवाले! और किसी से न धारण किये जानेवाले प्रभो! (ते) = आपके (या) = जो (परमाणि धामानि) = उत्कृष्ट धाम [property, wealth] ज्ञानरूप सम्पत्तियाँ हैं, (या) = जो (अवमा) = ये सबसे कनिष्ठ (धामानि) = लक्ष्मीरूप सम्पत्तियाँ हैं (उत) = और (या मध्यमा) = 'बल व शक्ति रूप सम्पत्तियाँ हैं (इमा) = इन सबको (सखिभ्यः) = अपने इन सदा सयुज सखाओं-जीवों के लिए (हविषि) = हवि के निमित्त (शिक्ष) = दीजिए [शिक्ष= देहि-म०] आपसे ज्ञान, धन व बल को प्राप्त करके आपके सखा ये जीव इनका हविरूप में ही प्रयोग करें। इनसे वे औरों का कल्याण करनेवाले बनें। २. अपने सखा जीव की इस प्रार्थना को सुनकर प्रभु कहते हैं कि (तन्वम्) = अपने शरीरों की शक्तियों को (वृधान:) = बढ़ाते हुए स्वयं (यजस्व) = तू इन वस्तुओं से स्वयं सङ्गत हो । जब मनुष्य पुरुषार्थ करता है, शान्त होकर रुक नहीं जाता तब वह अवश्य ही प्रभु को पानेवाला बनता है। जीव को चाहिए कि संयम से सबल होकर स्वयं ही प्रभु को प्राप्त करे और प्रभु के सब धामों को प्राप्त करने का अधिकारी बने ।
Essence
भावार्थ- प्रभु के सब धाम = सम्पत्तियाँ ज्ञान, धन व बल अपनी शक्तियों का विस्तार करनेवालों को ही प्राप्त होते हैं।
Subject
परम-अवम-मध्यम धाम