Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 2

99 Mantra
17/2
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृद्विकृतिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ॒मा मे॑ऽअग्न॒ऽइष्ट॑का धे॒नवः॑ स॒न्त्वेका॑ च॒ दश॑ च॒ दश॑ च श॒तं च॑ श॒तं च॑ स॒हस्रं॑ च स॒हस्रं॑ चा॒युतं॑ चा॒युतं॑ च नि॒युतं॑ च नि॒युतं॑ च प्र॒युतं॒ चार्बु॑दं च॒ न्यर्बुदं च समु॒द्रश्च॒ मध्यं॒ चान्त॑श्च परा॒र्द्धश्चै॒ता मे॑ऽअग्न॒ऽइष्ट॑का धे॒नवः॑ सन्त्व॒मु॒त्रा॒मुष्मिँ॑ल्लो॒के॥२॥

इ॒माः। मे॒। अ॒ग्ने॒। इष्ट॑काः। धेनवः॑। स॒न्तु॒। एका॑। च॒। दश॑। च॒। दश॑। च॒। श॒तम्। च॒। श॒तम्। च॒। स॒हस्र॑म्। च॒। स॒हस्र॑म्। च॒। अ॒युत॑म्। च॒। अ॒युत॑म्। च॒। नि॒युत॒मिति॑ नि॒ऽयुत॑म्। च॒। नि॒युत॒मिति॑ नि॒ऽयुत॑म्। च॒। प्र॒युत॒मिति॑ प्र॒ऽयुत॑म्। च॒। अर्बु॑दम्। च॒। न्य॑र्बुद॒मिति॒ निऽअ॑र्बुदम्। च॒। स॒मु॒द्रः। च॒। मध्य॑म्। च॒। अन्तः॑। च॒। प॒रा॒र्द्धः। च॒। ए॒ताः। मे॒। अ॒ग्ने॒। इष्ट॑काः। धे॒नवः॑। स॒न्तु॒। अ॒मुत्र॑। अमुष्मि॑न्। लो॒के ॥२ ॥

Mantra without Swara
इमा मेऽअग्नऽइष्टका धेनवः सन्त्वेका च दश च दश च शतञ्च शतञ्च सहस्रञ्च सहस्रञ्चायुतञ्चायुतञ्च नियुतञ्च नियुतञ्च प्रयुतञ्चार्बुदञ्च न्यर्बुदञ्च समुद्रश्च मध्यञ्चान्तश्च परार्धश्चौता मेऽअग्नऽइष्टका धेनवः सन्त्वमुत्रामुष्मिँल्लोके ॥

इमाः। मे। अग्ने। इष्टकाः। धेनवः। सन्तु। एका। च। दश। च। दश। च। शतम्। च। शतम्। च। सहस्रम्। च। सहस्रम्। च। अयुतम्। च। अयुतम्। च। नियुतमिति निऽयुतम्। च। नियुतमिति निऽयुतम्। च। प्रयुतमिति प्रऽयुतम्। च। अर्बुदम्। च। न्यर्बुदमिति निऽअर्बुदम्। च। समुद्रः। च। मध्यम्। च। अन्तः। च। परार्द्धः। च। एताः। मे। अग्ने। इष्टकाः। धेनवः। सन्तु। अमुत्र। अमुष्मिन्। लोके॥२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में वृष्टि से होनेवाले 'अन्न - रस का' उल्लेख था । वस्तुतः 'पर्जन्यादन्नसम्भवः' में कल्याण करनेवाली होती है। सब अन्न का सम्भव पर्जन्य से ही होता है, परन्तु यह पर्जन्य 'यज्ञाद् भवति पर्जन्य:' इस वाक्य के अनुसार यज्ञ से होता है, अतः प्रस्तुत मन्त्र में इस यज्ञ के पालकत्व का प्रतिपादन करते हुए मेधातिथि के मुख से प्रार्थना कराते हैं कि हे अग्ने यज्ञादि में विनियुक्त होकर बादलों को जन्म देनेवाले अग्ने ! इमाः = ये ये इस देह से किये जानेवाले इष्टकाः = यज्ञ [यज्+क्त=इष्ट, इष्ट+टाप्] धेनवः सन्तु - दुधारू गौवों के समान हमारा पालन करनेवाले हों। वस्तुतः यज्ञ बादलों की उत्पत्ति द्वारा अन्नादि का कारण बनकर सदा हमारा पालन करता है तथा रोगकृमियों के संहार के द्वारा भी यह यज्ञ हमारा रक्षक होता है। २. ये यज्ञ तो मेरे जीवन में निरन्तर चलें, मेरा जीवन ही यज्ञमय हो जाए। एका च= यह यज्ञ प्रत्येक प्रात:काल में एक संख्यावाला होता हुआ भी दश च प्रतिदिन होने से दस संख्यावाला हो, दश च दस संख्यावाला ही क्या शतं च यह सौ संख्यावाला हो। शतं च सौ क्यों ? सहस्रं च = - मेरा जीवन हज़ारों यज्ञों से युक्त हो । सहस्त्रं च सहस्र ही क्यों? अयुतं च- मेरा जीवन दस हज़ार यज्ञोंवाला हो। अयुतं च नियुतं च-दस हज़ार यज्ञोंवाला होता हुआ यह मेरा जीवन एक लाख यज्ञोंवाला हो । नियुतं च प्रयुतं च-एक लाख से भी अधिक दस लाख इन यज्ञों की संख्या हो । अर्बुदं च ये यज्ञ एक करोड़ हो जाएँ। न्यर्बुदं च-दस करोड़ तक इनकी संख्या हो । प्रत्येक घर में होने पर इनकी संख्या दस करोड़ ही क्यों? समुद्रश्च ये यज्ञ अरब संख्या तक पहुँचे, मध्यं = दस अरब तथा अन्तः च खरब तथा परार्धश्च = ये यज्ञ तो दस खरब हो जाएँ। ३. मैं तो यह चाहता हूँ कि अग्ने-सब यज्ञों के प्रवर्तक प्रभो ! एता में इष्टकाः- ये मेरे यज्ञ अमुत्र = परलोक में अमुष्मिन् लोके= उस दूर लोक में भी धेनवः सन्तु मेरा पालन करनेवाले हों। इस लोक में तो ये यज्ञ कल्याण करते ही हैं, ये परलोक में भी कल्याणकारक हों ।
Essence
भावार्थ- हम अपने जीवनों को यज्ञमय बनाएँ। यज्ञ इस लोक में सात्त्विक अन्न व नीरोगता देनेवाला होकर कल्याण करता है तथा यज्ञ में निहित त्याग की भावना परलोक
Subject
यज्ञ