Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 16

99 Mantra
17/16
Devata- अग्निर्देवता Rishi- भारद्वाज ऋषिः Chhand- निचृदार्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ग्निस्ति॒ग्मेन॑ शो॒चिषा॒ यास॒द्विश्वं॒ न्यत्रिण॑म्। अ॒ग्निर्नो॑ वनते र॒यिम्॥१६॥

अ॒ग्निः ति॒ग्मेन॑। शो॒चिषा॑। यास॑त्। विश्व॑म्। नि। अ॒त्रिण॑म्। अ॒ग्निः। नः॒। व॒न॒ते॒। र॒यिम् ॥१६ ॥

Mantra without Swara
अग्निस्तिग्मेन शोचिषा यासद्विश्वन्न्यत्रिणम् । अग्निर्ना वनते रयिम् ॥

अग्निः तिग्मेन। शोचिषा। यासत्। विश्वम्। नि। अत्रिणम्। अग्निः। नः। वनते। रयिम्॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रस्तुत मन्त्र में 'अग्नि' का लक्षण दिया है। 'अग्नि' वह पुरुष है जिसने अपने को अग्र स्थान पर प्राप्त कराया है तथा औरों को अग्र स्थान पर पहुँचाने में सहायक हो रहा है। इसी उद्देश्य से यह ज्ञान प्रसार के कार्य में प्रवृत्त हुआ है। इस ज्ञान प्रसार के कार्य में लगने से पहले यह (अग्निः) = अग्रेणी पुरुष (तिग्मेन शोचिषा) = बड़ी तीव्र ज्ञान की ज्योति से (विश्वम्) = हमारे न चाहते हुए भी हममें घुस आनेवाली (अत्रिणम्) = हमें खा जानेवाली 'काम, क्रोध, लोभ' आदि वृत्तियों को (नियासत्) = नितरां क्षीण करता है [यास् उपक्षये] 'काम, क्रोध, लोभ' आदि वृत्तियों पर पूर्ण प्रभुत्व पाने का प्रयत्न करता है। इन्हें वशीभूत करके ही यह औरों को ज्ञान देनेवाला बनेगा। २. यह (अग्निः) = अग्रेणी पुरुष (नः रयिम्) = हमारे धन को (वनते) = संविभागपूर्वक सेवन करनेवाला होता है। [वनतिर्दानार्थ:- उ०] यह धन को देकर बचे हुए को ही सदा खाता है। यह धन को प्रभु का ही समझता है। परिणामस्वरूप इसका जीवन पवित्र बना रहता है।
Essence
भावार्थ - १. 'अग्नि' वह है जो तीव्र ज्ञान से कामादि वासनाओं को क्षीण कर देता है । वासनाओं को क्षीण करके यह 'भारद्वाज' अपने में शक्ति भरनेवाला बनता है। २. यह धन कमाता है, परन्तु उसे प्रभु का समझता हुआ सदा संविभागपूर्वक सेवन करता है।
Subject
'अग्नि' का लक्षण