Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 1

99 Mantra
17/1
Devata- मरुतो देवताः Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- भुरिगतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अश्म॒न्नूर्जं॒ पर्व॑ते शिश्रिया॒णाम॒द्भ्यऽओष॑धीभ्यो॒ वन॒स्पति॑भ्यो॒ऽअधि॒ सम्भृ॑तं॒ पयः॑। तां न॒ऽइष॒मूर्जं॑ धत्त मरुतः सꣳररा॒णाऽअश्म॑ꣳस्ते॒ क्षुन् मयि॑ त॒ऽऊर्ग्यं॑ द्वि॒ष्मस्तं ते॒ शुगृ॑च्छतु॥१॥

अश्म॑न्। ऊर्ज॑म्। पर्व॑ते। शि॒श्रि॒या॒णाम्। अ॒द्भ्य इत्य॒त्ऽभ्यः। ओष॑धीभ्यः। वन॒स्पति॑भ्य इति॒ वन॒स्पति॑ऽभ्यः अधि॑। सम्भृ॑त॒मिति॒ सम्ऽभृ॑तम्। पयः॑। ताम्। नः॒। इष॑म्। ऊर्ज॑म्। ध॒त्त॒। म॒रु॒तः॒। स॒ꣳर॒रा॒णा इति॑ सम्ऽरराणाः। अश्म॑न्। ते॒। क्षुत्। मयि॑। ते॒। ऊर्क्। यम्। द्वि॒ष्मः। तम्। ते॒। शुक्। ऋ॒च्छ॒तु॒ ॥१ ॥

Mantra without Swara
अश्मन्नूर्जम्पर्वते शिश्रियाणामद्भ्यऽओषधीभ्यो वनस्पतिभ्योऽअधि सम्भृतम्पयः । तान्नऽइषमूर्जन्धत्त मरुतः सँरराणाः अश्मँस्ते क्षुन्मयि तऽऊर्ग्ययन्द्विष्मस्तन्ते शुगृच्छतु ॥

अश्मन्। ऊर्जम्। पर्वते। शिश्रियाणाम्। अद्भय इत्यत्ऽभ्यः। ओषधीभ्यः। वनस्पतिभ्य इति वनस्पतिऽभ्यः अधि। सम्भृतमिति सम्ऽभृतम्। पयः। ताम्। नः। इषम्। ऊर्जम्। धत्त। मरुतः। सꣳरराणा इति सम्ऽरराणाः। अश्मन्। ते। क्षुत्। मयि। ते। ऊर्क्। यम्। द्विष्मः। तम्। ते। शुक्। ऋच्छतु॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (संरराणा:) = [संरममाणाः] आकाश में सम्यक् रमण करते हुए, अर्थात् ठीक समय पर गति करते हुए, अथवा सम्यक् रान्ति = सम्यक् वृष्टि करनेवाले मरुतः = वायुओ ! [monsoon winds] अश्मन् = [ अशनवति] सब भोजनों को प्राप्त करानेवाले इस मेघ में तथा पर्वते पर्वतों पर शिश्रियाणाम् = आश्रित - इन पर्वतों पर वृष्टि होकर विविध ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं तथा वहाँ से नदियों के रूप में यह जल बहकर मैदानों में भी अन्न इत्यादि की उत्पत्ति का कारण बनता है। एवं, हमारा सारा अन्न इन मेघों एवं पर्वतों पर ही आश्रित है। इस मेघ व पर्वतों पर आश्रित ऊर्जम्- [ऊर्ज बलप्राणनयोः] बल व प्राणशक्ति के बढ़ानेवाले अन्न को नः = हमारे लिए दो । २. हे मरुतो ! आपसे कराई गई वृष्टि के इन अद्भ्यः =जलों से ओषधीभ्यः वनस्पतिभ्यः = ओषधियों व वनस्पतियों से पय:- दूध अधिसम्भृतम् - गौ इत्यादि पशुओं में आधिक्येन संभृत होता है। जल पीकर ओषधि वनस्पतियों का सेवन करके ये गौवें हमारे लिए उत्कृष्ट दूध का पोषण करती हैं। ३. हे मरुतः = वायुओ! ताम्-उस इषम् ऊर्जम् = अन्न व रस का नः = हमारे लिए धत्त धारण करो । ४. अश्मन् - हे भक्षक अग्ने [ उ० ] ! ते क्षुत् मयि = तेरे - वैश्वानर अग्नि के रूप में जठर में स्थित होकर भोजन के ठीक पाचन से होनेवाली भूख मुझमें हो, अर्थात् मेरी जठराग्नि ठीक हो और मैं उचित भूख को अनुभव करूँ। हे अश्मन् सब भोजनों को प्राप्त करानेवाले [ अशनवति] मेघ ते ऊर्क्= तेरा यह शक्तिप्रद अन्न मुझमें हो। ५. ते शुक्= तेरा शोक व सन्ताप, अन्न के अधिक खाजाने से होनेवाला कष्ट तं ऋच्छतु उसी को प्राप्त हो जो सबके साथ द्वेष करता रहता है और परिणामतः हम सब भी यं द्विष्मः - जिसे अप्रीतिकर समझते हैं। इस वैर- रुचि पुरुष को ही अन्न सन्तापकारी हो ।
Essence
भावार्थ - १. हम वृष्टि से उत्पन्न अन्न व रस को प्राप्त करें। २. हमें इन ओषधियों का सेवन करनेवाली गौवों का दूध प्राप्त हो । ३. हमें सदा उचित भूख लगे। ४. अन्न हमारे लिए सन्तापकारी न हों।
Subject
मेधातिथि का खान-पान