Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 7

66 Mantra
16/7
Devata- रुद्रो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- विराडार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒सौ योऽव॒सर्प॑ति॒ नील॑ग्रीवो॒ विलो॑हितः। उ॒तैनं॑ गो॒पाऽअ॑दृश्र॒न्नदृ॑श्रन्नुदहा॒र्य्यः स दृ॒ष्टो मृ॑डयाति नः॥७॥

अ॒सौ। यः। अ॒व॒सर्प्प॒तीत्य॑व॒ऽसर्प्प॒ति। नील॑ग्रीव॒ इति॒ नील॑ऽग्रीवः। विलो॑हित॒ इति॒ विऽलो॑हितः। उ॒त। ए॒न॒म्। गो॒पाः। अ॒दृ॒श्र॒न्। अदृ॑श्रन्। उ॒द॒हा॒र्य्य᳕ इत्यु॑दऽहा॒र्य्यः᳕। सः। दृ॒ष्टः। मृ॒ड॒या॒ति॒। नः॒ ॥७ ॥

Mantra without Swara
असौ योवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः । उतैनङ्गोपाऽअदृश्रन्नदृश्रन्नुदहार्यः स दृष्तो मृडयाति नः ॥

असौ। यः। अवसर्प्पतीत्यवऽसर्प्पति। नीलग्रीव इति नीलऽग्रीवः। विलोहित इति विऽलोहितः। उत। एनम्। गोपाः। अदृश्रन्। अदृश्रन्। उदहार्य्य इत्युदऽहार्य्यः। सः। दृष्टः। मृडयाति। नः॥७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के राजा का ही वर्णन करते हुए कहते हैं कि (असौ) = वह (यः) = जो सबकी शिकायतों को दूर करके उन्हें सुखी करता है। (अवसर्पति) = अपने उच्च सिंहासन से नीचे [अव] आता है, आसन पर ही नहीं जमा बैठा रहता, अपितु [अव= away ] राष्ट्र में नियत किये हुए अध्यक्षों के कार्यों को देखने के लिए दूर-दूर तक गति करनेवाला होता है। इसके इस निरीक्षण कार्य के कारण ही अध्यक्ष प्रमत्त व रिश्वत लेनेवाले नहीं होते। २. (नीलग्रीवः = कल्माषग्रीवः) = विविध विद्याओं से सुभूषित कण्ठवाला यह राजा है। 'शुद्धकण्ठस्वराय' [द० १६।८] बड़े शुद्ध कण्ठ स्वर से यह युक्त है। इसकी वाणी स्पष्ट व मधुर है। यह अपने शासनों को बड़ी स्पष्टता से देता है । ३. (विलोहितः) = [विविधैः शुद्धगुणकर्मस्वभावै रोहितो वृद्धः - द०] विविध शुद्ध गुण-कर्म व स्वभावों से यह खूब बढ़ा हुआ व उन्नत है। अथवा [विशिष्टं लोहितं यस्य] विशिष्ट रुधिरवाला है। शुद्ध क्षत्रियवंश में उत्पन्न हुआ है। ४. ऐसा होता हुआ भी यह प्रजाओं के लिए अनभिगम्य नहीं और तो और (एनं गोपाः उत) = इसको तो ग्वाले भी (अदृश्रन्) = देख पाते हैं- (उदहार्य:) = पानी ढोनेवाली कहारिन की भी (अदृश्रन्) = इस तक पहुँच हो सकती हैं। वे भी अपनी शिकायत को इस तक पहुँचाने के लिए इससे मिल सकती हैं। यह राजा राष्ट्र में छोटे-से-छोटे व्यक्ति की भी शिकायत सुनता है। ५. सुनकर अनसुना नहीं कर देता अपितु (दृष्टः सः) = देखा हुआ वह राजा जिसको मिलकर हमने अपनी दुःख की गाथा सुनाई है (नः मृडयाति) = हमारी शिकायतों को दूर करने की व्यवस्था करके हमें सुखी बनाता है।
Essence
भावार्थ - राजा प्रजा में विचरता है, खूब ज्ञानी व मधुर स्वरवाला है, खूब उन्नत व विशिष्ट रुधिरवाला तथा तेजस्वी है। छोटे-से-छोटे व्यक्ति के लिए अभिगम्य है। वह
Subject
नीलग्रीवो विलोहित