Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 64

66 Mantra
16/64
Devata- रुद्रा देवताः Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवा ऋषयः Chhand- निचृद्धृतिः Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
नमो॑ऽस्तु रु॒द्रेभ्यो॒ ये दि॒वि येषां॑ व॒र्षमिष॑वः। तेभ्यो॒ दश॒ प्राची॒र्दश॑ दक्षि॒णा दश॑ प्र॒तीची॒र्दशोदी॑ची॒र्दशो॒र्ध्वाः। तेभ्यो॒ नमो॑ऽअस्तु॒ ते नो॑ऽवन्तु॒ ते नो॑ मृडयन्तु॒ ते यं द्वि॒ष्मो यश्च॑ नो॒ द्वेष्टि॒ तमे॑षां॒ जम्भे॑ दध्मः॥६४॥

नमः॑। अ॒स्तु॒। रु॒द्रेभ्यः॑। ये। दि॒वि। येषा॑म्। व॒र्षम्। इष॑वः। तेभ्यः॑। दश॑। प्राचीः॑। दश॑। द॒क्षि॒णाः। दश॑। प्र॒तीचीः॑। दश॑। उदी॑चीः। दश॑। ऊ॒र्ध्वाः। तेभ्यः॑। नमः॑। अ॒स्तु॒। ते। नः॒। अ॒व॒न्तु॒। ते। नः॒। मृ॒ड॒य॒न्तु॒। ते। यम्। द्वि॒ष्मः। यः। च॒। नः॒। द्वेष्टि॑। तम्। ए॒षा॒म्। जम्भे॑। द॒ध्मः॒ ॥६४ ॥

Mantra without Swara
नमोस्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि येषाँवर्षमिषवः । तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोर्ध्वाः । तेभ्यो नमोअस्तु ते नो वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यन्द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषाञ्जम्भे दध्मः ॥

नमः। अस्तु। रुद्रेभ्यः। ये। दिवि। येषाम्। वर्षम्। इषवः। तेभ्यः। दश। प्राचीः। दश। दक्षिणाः। दश। प्रतीचीः। दश। उदीचीः। दश। ऊर्ध्वाः। तेभ्यः। नमः। अस्तु। ते। नः। अवन्तु। ते। नः। मृडयन्तु। ते। यम्। द्विष्मः। यः। च। नः। द्वेष्टि। तम्। एषाम्। जम्भे। दध्मः॥६४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (रुद्रेभ्यः नमः अस्तु) = रुद्रों के लिए, राजा की ओर से नियुक्त [रुत्-ज्ञानं राति ददति] ज्ञान देनेवाले पुरुषों के लिए नमस्कार हो । उन रुद्रों के लिए (ये) = जो (दिवि) = [दिव- प्रकाश] प्रकाश फैलाने के कार्य में नियुक्त हैं, जिन्होंने दिवि प्रकाश के क्षेत्र में द्युलोक व मस्तिष्क पर पूर्ण आधिपत्य प्राप्त किया है। २ (वर्षम्) = ज्ञान की वर्षा ही (येषाम्) = जिनके (इषवः) = बाण हैं, अर्थात् जो ज्ञान की वर्षा के द्वारा लोगों के दुःखों को दूर करने में लगे हैं । ३. (तेभ्य:) = इन ज्ञानवर्षणरूप बाणोंवाले रुद्रों के लिए (दश) = दस (प्राची:) = पूर्वाभिमुख. पूर्व की ओर अंगुलियों को करता हूँ, अर्थात् बद्धाञ्जलि होकर प्रणाम करता हूँ। (दश दक्षिणा:) = इसी प्रकार से दक्षिणाभिमुख दस अंगुलियों को करता हूँ। (दश प्रतीची:) = पश्चिमाभिमुख दस अंगुलियों को करता हूँ। (दश उदीची:) = उत्तराभिमुख दस अंगुलियों को करता हूँ (दश ऊर्ध्वा:) = और ऊपर की ओर दस अंगुलियों को करता हूँ, अर्थात् इन ज्ञानप्रसारक रुद्रों के लिए सब दिशाओं में नमस्कार करता हूँ। ४. (तेभ्यः नमः अस्तु) = इन रुद्रों के लिए अञ्जलिपूर्वक हमारा नमस्कार हो। 'दश वा अञ्जलेरंगुलयो, दिशि दिश्येवैभ्यः एतदञ्जलिं करोति' - श० ९।१।१ । ३९ । (ते नः अवन्तु) = ये रुद्र ज्ञान देकर हमारी रक्षा करें। (ते नो मृडयन्तु) = इस ज्ञान-प्रदान द्वारा वे रुद्र हमारे जीवन को सुखी करें। ५. (ते) = वे रुद्र तथा हम सभी (यं द्विष्मः) = जिस ज्ञान में रुचि न रखनेवाले मूर्ख व्यक्ति को प्रीति के अयोग्य समझते हैं [द्विष अप्रीतौ] (यः च) = और जो (नः द्वेष्टि) = हम सबसे द्वेष करता है, अर्थात् सारे समाज का विरोध करता है और वस्तुतः उस विरोध के कारण ही द्वेष्य हो गया है, (तम्) = उसे (एषाम्) = इन रुद्रों के ही (जम्भे दध्मः) = दंष्ट्राकराल मुख में स्थापित करते हैं, [जम्भे विडाल के मुख में मूषक के समान पीड़ा में - द०] इसे न्यायोचित दण्ड देने के लिए व इसकी मनोवृत्ति को सुधारने के लिए उन्हें सौंपते हैं।
Essence
भावार्थ-वे राज्याधिकारी, जो प्रजा के मस्तिष्क को उज्ज्वल बनाने के लिए, ज्ञानवर्षण के लिए नियुक्त हुए हैं, उन राज्याधिकारियों का हम आदर करते हैं।
Subject
ये दिवि येषां वर्षम् इषवः