Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 62

66 Mantra
16/62
Devata- रुद्रा देवताः Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवा ऋषयः Chhand- विराडार्ष्यनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
येऽन्ने॑षु वि॒विध्य॑न्ति॒ पात्रे॑षु॒ पिब॑तो॒ जना॑न्। तेषा॑ सहस्रयोज॒नेऽव॒ धन्वा॑नि तन्मसि॥६२॥

ये। अन्ने॑षु। वि॒वि॒ध्य॒न्तीति॑ वि॒ऽविध्य॑न्ति। पात्रे॑षु। पिब॑तः। जना॑न्। तेषा॑म्। स॒ह॒स्र॒योज॒न इति॑ सहस्रऽयो॒ज॒ने। अव॑। धन्वा॑नि। त॒न्म॒सि॒ ॥६२ ॥

Mantra without Swara
येन्नेषु विविध्यन्ति पात्रेषु पिबतो जनान् । तेषाँ सहस्रयोजने व धन्वानि तन्मसि ॥

ये। अन्नेषु। विविध्यन्तीति विऽविध्यन्ति। पात्रेषु। पिबतः। जनान्। तेषाम्। सहस्रयोजन इति सहस्रऽयोजने। अव। धन्वानि। तन्मसि॥६२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (ये) = जो (अन्नेषु) = अन्नों के विषयों में (विविध्यन्ति) = [ विध्= To administer, govern] विविध निर्देश देते हैं तथा २. (पात्रेषु) = पात्रों में (पिबतः) = दुग्ध, लस्सी आदि पीते हुए जनान्-लोगों को (विविध्यन्ति) = विशेषरूप से शासित करते हैं कि इस प्रकार के पेय के लिए इन पात्रों का प्रयोग करना है और इनका नहीं' [लस्सी के लिए बिना कलईवाले पात्र का प्रयोग नहीं करना] । ३. (तेषाम्) = उन रुद्रों के प्रजा के रोगों को दूर करनेवाले राजपुरुषों के (धन्वानि) = अस्त्रों को (सहस्त्रयोजने) = हज़ारों योजनों की दूरी तक (अवतन्मसि) = विस्तृत करते हैं।
Essence
भावार्थ - राजपुरुषों को प्रजा के अन्दर 'खान-पान' के नियमों का भी विशेषरूप से अनुशासन करना है, जिससे सब प्रजाएँ नीरोग होकर सुखी हो सकें।
Subject
खान-पान के विषय में प्रेरणा [स्वास्थ्य विभाग]