Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 59

66 Mantra
16/59
Devata- रुद्रा देवताः Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवा ऋषयः Chhand- आर्ष्युनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ये भू॒ताना॒मधि॑पतयो विशि॒खासः॑ कप॒र्दिनः॑। तेषा॑ सहस्रयोज॒नेऽव॒ धन्वा॑नि तन्मसि॥५९॥

ये। भू॒ताना॑म्। अधि॑पतय॒ इत्यधि॑ऽपतयः॒। वि॒शि॒खास॒ इति॑ विऽशि॒खासः॑। क॒प॒र्दिनः॑। तेषा॑म्। स॒ह॒स्र॒यो॒ज॒न इति॑ सहस्रऽयोज॒ने। अव॑। धन्वा॑नि। त॒न्म॒सि॒ ॥५९ ॥

Mantra without Swara
ये भूतानामधिपतयो विशिखासः कपर्दिनः । तेषाँ सहस्रयोजने व धन्वानि तन्मसि॥

ये। भूतानाम्। अधिपतय इत्यधिऽपतयः। विशिखास इति विऽशिखासः। कपर्दिनः। तेषाम्। सहस्रयोजन इति सहस्रऽयोजने। अव। धन्वानि। तन्मसि॥५९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (ये) = जो (भूतानाम् अधिपतयः) = शरीर के अङ्गभूत 'पृथिवी, जल, तेज, वायु व आकाश' इन पाँचों भूतों के अधिपति हैं, अर्थात् इन्हें जिन्होंने पूर्णतया अपने अनुकूल बनाया है, अर्थात् जो पूर्ण स्वस्थ हैं २. (विशिखासः) = [शिखा ज्वाला] विशिष्ट ज्ञान की ज्योतिवाले हैं ३. (कपर्दिनः) = प्रजाओं के लिए सुख की पूर्ति करनेवाले हैं, अर्थात् विशिष्ट व्यवस्थाओं के द्वारा प्रजा के जीवन को सुखी बनानेवाले हैं। ४. (तेषाम्) = उन रुद्रों के प्रजा के दुःखों का द्रावण करनेवाले राजपुरुषों के धन्वानि अस्त्रों को सहस्रयोजने हज़ारों योजनों की दूरी तक अवतन्मसि सुदूर विस्तृत करते हैं।
Essence
भावार्थ - राजपुरुषों को [क] पूर्ण स्वस्थ होना चाहिए, [ख] ज्ञान की ज्योतिवाला होना चाहिए तथा [ग] उनका ध्येय प्रजा के जीवन को सुखी करना हो [ कपर्दिनः] ।
Subject
विशिखासः [विशिष्ट ज्ञान की ज्वालावाले]