Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 55

66 Mantra
16/55
Devata- रुद्रा देवताः Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवा ऋषयः Chhand- भुरिगार्ष्युष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ॒स्मिन् म॑ह॒त्यर्ण॒वेऽन्तरि॑क्षे भ॒वाऽअधि॑। तेषा॑ सहस्रयोज॒नेऽव॒ धन्वा॑नि तन्मसि॥५५॥

अ॒स्मिन्। म॒ह॒ति। अ॒र्ण॒वे। अ॒न्तरि॑क्षे। भ॒वाः। अधि॑। तेषा॑म्। स॒ह॒स्र॒यो॒जन इति॑ सहस्रऽयोज॒ने। अव॑। धन्वा॑नि। त॒न्म॒सि॒ ॥५५ ॥

Mantra without Swara
अस्मिन्महत्यर्णवेन्तरिक्षे भवा अधि । तेषाँ सहस्रयोजने व धन्वानि तन्मसि ॥

अस्मिन्। महति। अर्णवे। अन्तरिक्षे। भवाः। अधि। तेषाम्। सहस्रयोजन इति सहस्रऽयोजने। अव। धन्वानि। तन्मसि॥५५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (भवाः) = [भवति अस्मिन्] जिनके रक्षाकार्य में ही राष्ट्र की स्थिति सम्भव है वे राजपुरुष, जो (अस्मिन्) = इस (महति) = विशाल (अर्णवे) = दया के जलवाले (अन्तरिक्षे अधि) = हृदयान्तरिक्ष पर पूर्ण आधिपत्य रखते हैं, अर्थात् [क] जिनका हृदय विशाल है । [ख] दुःखियों को देखकर जिनका हृदय दयार्द्र हो उठता है। [ग] जिनके हृदय में वासनाओं के तूफान नहीं उठते, जो सदा मध्यमार्ग में चलते हैं। २. (तेषाम्) = उनके (धन्वानि) = अस्त्रों को सहस्त्रयोजने हज़ारों योजनों की दूरी तक (अवतन्मसि) = सुदूर विस्तृत करते हैं।
Essence
भावार्थ - राजपुरुष १. हृदय के दृष्टिकोण से सदा मध्यमार्ग पर चलनेवाले हों । २. और अस्त्र-विद्या में पारङ्गत हो।
Subject
अधि अन्तरिक्षे