Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 51

66 Mantra
16/51
Devata- रुद्रा देवताः Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवा ऋषयः Chhand- निचृदार्षी यवमध्या त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मीढु॑ष्टम॒ शिव॑तम शि॒वो नः॑ सु॒मना॑ भव। प॒र॒मे वृ॒क्षऽआयु॑धं नि॒धाय॒ कृत्तिं॒ वसा॑न॒ऽआ च॑र॒ पिना॑क॒म्बिभ्र॒दा ग॑हि॥५१॥

मीढु॑ष्टम। मीढु॑स्त॒मेति॒ मीढुः॑ऽतम। शिव॑त॒मेति॒ शिव॑ऽतम। शि॒वः। नः॒। सु॒मना॒ इति॑ सु॒ऽमनाः॑। भ॒व॒। प॒र॒मे। वृ॒क्षे। आयु॑धम्। नि॒धायेति॑ नि॒ऽधाय॑। कृत्ति॑म्। वसा॑नः। आ। च॒र॒। पिना॑कम्। बिभ्र॑त्। आ। ग॒हि॒ ॥५१ ॥

Mantra without Swara
मीढुष्टम शिवतम शिवो नः सुमना भव । परमे वृक्ष आयुधन्निधाय कृत्तिँवसानऽआचर पिनाकम्बिभ्रदा गहि ॥

मीढुष्टम। मीढुस्तमेति मीढुःऽतम। शिवतमेति शिवऽतम। शिवः। नः। सुमना इति सुऽमनाः। भव। परमे। वृक्षे। आयुधम्। निधायेति निऽधाय। कृत्तिम्। वसानः। आ। चर। पिनाकम्। बिभ्रत्। आ। गहि॥५१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (मीढुष्टम) = अतिशयेन (मीढ्वान्) = सर्वाधिक सुखों का सेचन करनेवाले (शिवतम) = अधिक-से-अधिक कल्याण करनेवाले राजन् ! (नः) = हमारे लिए (शिवः) = कल्याण करनेवाले (सुमनाः) = उत्तम मनवाले भव होओ। राजा का मन सदा प्रजा के हित की कामनावाला हो तथा उसके सारे प्रयत्न प्रजा को सुखी बनाने के लिए हों। २. (परमे) = अत्यन्त प्रबल (वृक्षे) = [व्रश्चनीये छेदनीये शत्रुसैन्ये- द०] काटने योग्य शत्रुसैन्य पर (आयुधं निधाय) = खड्ग, भुशुण्डी और शतघ्नी आदि शस्त्रों को रखकर, अर्थात् इन आयुधों का शत्रुओं पर प्रयोग करते हुए, ३. (कृत्तिं वसानः) = छेदनक्रिया को धारण करता हुआ, अर्थात् शत्रुओं पर प्रयोग करता हुआ तू (आचर) = समन्तात् विचरण कर । ४. राष्ट्र की रक्षा के लिए (पिनाकम्) = [पाति रक्षति आत्मानं येन तद्धनुर्वर्मादिकम् - द०] रक्षा के साधनभूत धनुष को (बिभ्रत) = धारण किये हुए (आगहि) = तू आ।
Essence
भावार्थ-राजा ने प्रजा पर सुखों की वर्षा करनी है-प्रजा का कल्याण सिद्ध करना है। शत्रुओं पर शस्त्र प्रयोग द्वारा उनका छेदन करते हुए प्रजा के रक्षण के लिए धनुर्धर बनकर विचरना है।
Subject
वृक्ष पर आयुधस्थापन